Ajit Pawar Crash Case: FIR के लिए भटकते रहे रोहित पवार, अब बेंगलुरु में केस दर्ज

Ajit Pawar Crash Case: FIR के लिए भटकते रहे रोहित पवार, अब बेंगलुरु में केस दर्ज

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल तब तेज हो गई जब एनसीपी (एसपी) विधायक रोहित पवार ने 28 जनवरी को बारामती में हुए विमान हादसे को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए बेंगलुरु में ‘Zero FIR’ दर्ज कराई। इस हादसे में अजित पवार समेत पांच लोगों की मौत हुई थी। रोहित पवार ने इस घटना को ‘आपराधिक साजिश’ करार देते हुए जांच एजेंसियों और राज्य की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

रोहित पवार का आरोप है कि उन्होंने महाराष्ट्र में कई स्तरों पर शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन, बारामती पुलिस और राज्य सीआईडी ने उनकी FIR दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्होंने 23 मार्च को बेंगलुरु में ‘Zero FIR’ दर्ज कराई, जिसे बाद में संबंधित क्षेत्राधिकार के तहत महाराष्ट्र पुलिस को ट्रांसफर कर दिया गया है।

अपनी शिकायत में रोहित पवार ने पांच बड़े सवाल उठाए हैं, जो इस हादसे को संदिग्ध बनाते हैं। उन्होंने दावा किया कि विमान के उड़ान घंटों के रिकॉर्ड में भारी अंतर है, कम विजिबिलिटी के बावजूद लैंडिंग की अनुमति दी गई, आखिरी समय में पायलट बदला गया, हादसे से पहले पायलट के नाम पर लाइफ इंश्योरेंस लिया गया और पायलट का पिछला रिकॉर्ड भी विवादित रहा है। इन बिंदुओं ने पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है।

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इस बीच एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) की प्रारंभिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ‘लियरजेट 45 XR’ विमान कम विजिबिलिटी के बावजूद लैंडिंग के दौरान पेड़ों से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। सीसीटीवी फुटेज में भी विमान के असंतुलित होकर गिरने की पुष्टि बताई गई है। हालांकि, रोहित पवार का कहना है कि यदि पहले से नए विमान की खरीद का प्रस्ताव रद्द न किया गया होता, तो यह हादसा टल सकता था।

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मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब रोहित पवार ने सीबीआई जांच में हो रही देरी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस हाई-प्रोफाइल हादसे की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग किए 35 दिन से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि आगे जांच किस दिशा में बढ़ती है और क्या इस मामले में उच्चस्तरीय जांच एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपी जाती है या नहीं।

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