भारत पर मंडरा रहा ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा! रिकॉर्डतोड़ गर्मी, सूखा और बाढ़ से बढ़ सकती है तबाही

 भारत पर मंडरा रहा ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा! रिकॉर्डतोड़ गर्मी, सूखा और बाढ़ से बढ़ सकती है तबाही

नई दिल्ली: देशभर में पड़ रही भीषण गर्मी के बीच वैज्ञानिकों ने एक और बड़ी चेतावनी जारी की है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहा ‘सुपर अल नीनो’ आने वाले महीनों में भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र तक तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में हालात और भी भयावह हो सकते हैं। वैज्ञानिक इसे पिछले करीब 150 वर्षों की सबसे गंभीर जलवायु घटनाओं में से एक मान रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, अल नीनो का सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है, जो देश की कृषि और जल व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। अगर यह ‘सुपर अल नीनो’ मजबूत हुआ तो मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। वहीं दूसरी ओर कुछ तटीय और दक्षिणी इलाकों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाएगा। मौसम विभाग पहले ही संकेत दे चुका है कि इस बार औसत बारिश सामान्य से काफी कम रह सकती है, जिसका सबसे ज्यादा असर खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि ‘सुपर अल नीनो’ तब बनता है जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है। इस बार समुद्री तापमान में वृद्धि 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है, जो 1877 के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी पार कर सकती है। यही वजह है कि इसे संभावित रूप से सबसे खतरनाक जलवायु घटनाओं में गिना जा रहा है। अमेरिकी एजेंसी NOAA ने भी 2026 के अंत तक अल नीनो के बेहद मजबूत बने रहने की आशंका जताई है।

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देश में लगातार बढ़ती गर्मी के पीछे सिर्फ वैश्विक जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि स्थानीय कारण भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं। शहरों में तेजी से बढ़ता कंक्रीट, हरियाली की कमी, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाली गर्मी तथा लगातार सूखा मौसम ‘हीट आइलैंड इफेक्ट’ को और खतरनाक बना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में अगर शहरी विकास और पर्यावरण संतुलन के बीच तालमेल नहीं बैठाया गया तो भारत के बड़े शहर गर्मी के स्थायी केंद्र बन सकते हैं।

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आर्थिक मोर्चे पर भी इस संभावित संकट को बेहद गंभीर माना जा रहा है। इससे पहले 1982-83 और 1997-98 के अल नीनो ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाया था। भारत में इसका असर खाद्यान्न उत्पादन, बिजली मांग, जल संकट और महंगाई पर देखने को मिल सकता है। खासतौर पर खरीफ फसलों पर निर्भर करोड़ों किसानों के लिए कमजोर मानसून बड़ी चुनौती बन सकता है। मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर बारिश में भारी कमी आई तो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि वैज्ञानिकों ने लोगों से घबराने के बजाय सतर्क रहने की अपील की है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लू और गर्मी से बचाव के लिए पर्याप्त पानी पीने, धूप से बचने और कमजोर वर्गों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी है। वहीं सरकार और मौसम एजेंसियां भी हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। आने वाले महीनों में मानसून की चाल और समुद्री तापमान की स्थिति यह तय करेगी कि भारत को केवल भीषण गर्मी झेलनी पड़ेगी या फिर सूखा और बाढ़ जैसी दोहरी मार का सामना भी करना होगा।

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