कहीं रावण की पूजा, तो कहीं दहन से परहेज, भारत में दशहरे की ये परंपराएं हैं बेहद अनोखी
बिलासपुर : दशहरे के दिन श्रीराम की विजय और अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाया जाता हैं। जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले तैयार कर शाम उनका दहन किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है? कहीं उसे गांव का बेटा माना जाता है, तो कहीं दामाद के रूप में सम्मान दिया जाता है। इन अनोखी परंपराओं के पीछे स्थानीय मान्यताएं, धार्मिक आस्था और सदियों से चली आ रही लोककथाएं जुड़ी हैं।
बिसरख में रावण को मानते हैं गांव का बेटा
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित बिसरख गांव रावण से जुड़ी मान्यताओं के कारण खास पहचान रखता है। स्थानीय मान्यता है कि रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था। इसी वजह से यहां रावण को केवल रामायण के खलनायक के रूप में नहीं, बल्कि गांव से जुड़े एक पात्र के रूप में देखा जाता है। दशहरे के अवसर पर यहां रावण दहन के बजाय धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ को महत्व देने की परंपरा बताई जाती है। रावण की विद्वता और भगवान शिव के प्रति उसकी भक्ति भी इस मान्यता का प्रमुख हिस्सा है।
मंदसौर में रावण को मिलता है दामाद का सम्मान
मध्य प्रदेश के मंदसौर में रावण से जुड़ी एक दिलचस्प मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका इसी क्षेत्र में था। इसी कारण कुछ स्थानीय लोग रावण को अपना दामाद मानते हैं। यहां रावण की प्रतिमा और उससे जुड़ी धार्मिक परंपराएं लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। इस मान्यता के कारण कुछ लोग दशहरे पर रावण दहन के बजाय उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। उनके लिए रावण केवल एक पराजित राजा नहीं, बल्कि स्थानीय परंपरा और पारिवारिक संबंधों से जुड़ा रिश्तेदार भी है।
जोधपुर में कुछ समुदाय मनाते हैं शोक
राजस्थान के जोधपुर में भी रावण से जुड़ी अलग परंपरा देखने को मिलती है। यहां कुछ ब्राह्मण समुदाय रावण को अपना पूर्वज मानते हैं। इन समुदायों के लिए दशहरा केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि रावण की मृत्यु को याद करने का दिन भी है। ऐसे परिवार रावण दहन से दूरी रखते हैं और अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा-पाठ या शोक संबंधी अनुष्ठान करते हैं। हालांकि, यह पूरे जोधपुर की परंपरा नहीं है। शहर में दशहरा और रावण दहन के आयोजन भी होते हैं।
विदिशा के रावणग्राम में होती है पूजा
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का रावणग्राम भी रावण की प्रतिमा के लिए जाना जाता है। यहां स्थापित रावण की लेटी हुई प्रतिमा स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र है। रावण को यहां विद्वान और भगवान शिव का भक्त मानकर याद किया जाता है। दशहरे के अवसर पर श्रद्धालु प्रतिमा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय मान्यताओं में रावण के ज्ञान और शिवभक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है।
कानपुर में दशहरे पर खुलता है दशानन मंदिर
उत्तर प्रदेश के कानपुर के शिवाला क्षेत्र में स्थित दशानन मंदिर रावण से जुड़ी अनोखी परंपरा के कारण चर्चित है। यहां दशहरे के दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालु रावण के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, रावण को विद्वान और शिवभक्त के रूप में भी देखा जाता है। यहां पूजा की परंपरा इस बात का उदाहरण है कि धार्मिक मान्यताओं में रावण के व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को महत्व दिया जाता है।
बैजनाथ में रावण की शिवभक्ति का महत्व
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां प्रचलित लोककथाओं में रावण की कठोर तपस्या और शिवभक्ति का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से बैजनाथ का नाम भी रावण से जुड़ी धार्मिक चर्चाओं में आता है। इस क्षेत्र में दशहरे पर रावण दहन न करने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है, हालांकि इसे पूरे जिले की एक समान परंपरा नहीं माना जा सकता।
रावण दहन और पूजा, दोनों के पीछे हैं अलग मान्यताएं
रामायण में रावण को विद्वान, शक्तिशाली राजा और भगवान शिव का भक्त बताया गया है, लेकिन सीता हरण और अहंकार के कारण उसका अंत भगवान श्रीराम के हाथों हुआ। अधिकांश स्थानों पर रावण दहन इसी संदेश का प्रतीक है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः उनका पतन होता है।
दूसरी ओर, जिन स्थानों पर रावण की पूजा होती है, वहां उसकी विद्वता, शिवभक्ति, वंश परंपरा और स्थानीय संबंधों को अधिक महत्व दिया जाता है। रावण की पूजा का अर्थ उसके सभी कर्मों का समर्थन करना नहीं है, बल्कि उसके व्यक्तित्व के कुछ विशेष पहलुओं को सम्मान देना है।
भारत की ये परंपराएं धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की झलक दिखाती हैं। कहीं रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, तो कहीं उसकी प्रतिमा के सामने पूजा कर स्थानीय मान्यताओं को जीवित रखा जाता है। यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है, जहां एक ही पौराणिक कथा से जुड़ी परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप लेती हैं।
