उज्बेकिस्तान की युवतियों को अवैध हिरासत में रखने का आरोप: हाईकोर्ट का कड़ा रुख, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी

उज्बेकिस्तान की युवतियों को अवैध हिरासत में रखने का आरोप: हाईकोर्ट का कड़ा रुख, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी

बिलासपुर/रायपुर। राजधानी रायपुर में अवैध रूप से रहने के आरोप में हिरासत में ली गईं उज्बेकिस्तान की दो युवतियों के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। युवतियों की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने दोनों सरकारों से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता युवतियों को भी अपना जवाब पेश करने का निर्देश दिया है।

जानिए क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। फरवरी 2026 में पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि इलाके के एक होटल में उज्बेकिस्तान की दो युवतियां अवैध रूप से ठहरी हुई हैं। इस सूचना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया था। चूंकि मामला विदेशी नागरिकों की सुरक्षा और संदेहास्पद गतिविधियों से जुड़ा था, इसलिए इसकी आगे की जांच इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) को सौंप दी गई थी।

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बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जेल में रखने का आरोप

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अब इस मामले में युवतियों की ओर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में आरोप है कि युवतियों को 14 जनवरी 2026 से ही लगातार हिरासत में रखा गया है, जो पूरी तरह से गैरकानूनी है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, उन्हें बिना किसी औपचारिक गिरफ्तारी के रायपुर सेंट्रल जेल के डिटेंशन सेंटर में रखा गया और इस दौरान उन्हें किसी भी मजिस्ट्रेट या न्यायिक अधिकारी के सामने पेश नहीं किया गया।

वीजा खत्म होना महज एक तकनीकी त्रुटि: बचाव पक्ष

याचिका में दलील दी गई है कि हिरासत में रखने के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन हुआ है। आरोप है कि गिरफ्तारी के समय कोई स्पष्ट मामला दर्ज नहीं था और एफआईआर बाद में लिखी गई, जिससे इस पूरी हिरासत की वैधता पर ही सवाल खड़े होते हैं। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि दोनों युवतियां टूरिस्ट के रूप में भारत आई थीं और उनके पास वैध पासपोर्ट मौजूद हैं। वीजा की अवधि का समाप्त होना केवल एक 'तकनीकी त्रुटि' है।

युवतियों के वकीलों ने अदालत में तर्क दिया कि बिना मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए किसी को भी लंबे समय तक हिरासत में रखना भारतीय संविधान और आपराधिक न्याय व्यवस्था (CrPC) के नियमों का खुला उल्लंघन है।

सुनवाई के दौरान राज्य और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा। कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए दो सप्ताह का समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में सरकार के जवाब पर सबकी निगाहें टिकी होंगी।

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