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War & Children: क्या मासूमों को बनाया जा रहा है युद्ध का हिस्सा? सामने आई चौंकाने वाली रिपोर्ट
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान से सामने आई एक खबर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक Islamic Revolutionary Guard Corps ने सुरक्षा और सहायक गतिविधियों के लिए न्यूनतम आयु सीमा घटाकर 12 वर्ष कर दी है, जिससे अब किशोरों की भागीदारी को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है।
बताया जा रहा है कि 12-13 साल के बच्चों को ‘वॉलंटियर’ के तौर पर सड़कों पर गश्त, चेकपॉइंट्स संचालन और लॉजिस्टिक सपोर्ट जैसे कार्यों में शामिल किया जा रहा है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, बड़ी संख्या में किशोर खुद इस कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छा जता रहे थे, जिसके बाद आयु सीमा में बदलाव किया गया।
ईरान की इस पहल को ‘मातृभूमि रक्षा कार्यक्रम’ के तहत चलाया जा रहा है, जहां युवाओं को देश की सुरक्षा में योगदान देने का मौका दिया जा रहा है। हालांकि, यह कदम अंतरराष्ट्रीय नियमों और बाल अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े करता है।
गौरतलब है कि ईरान ने पहले बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन को स्वीकार किया था, जिसमें नाबालिगों को सैन्य गतिविधियों से दूर रखने की बात कही गई है। ऐसे में मौजूदा कदम को लेकर वैश्विक स्तर पर आलोचना और चिंता दोनों सामने आ रही हैं।
स्थानीय रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि कुछ इलाकों में किशोर चेकपॉइंट्स पर तैनात नजर आए हैं, जबकि कुछ मामलों में उन्हें हथियारों के साथ भी देखा गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, लेकिन इससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध जैसे हालात में युवाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करना लंबे समय में सामाजिक और मानसिक प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब ईरान के इस कदम पर टिकी हुई है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
