छत्तीसगढ़ में डायल 112 का अजीब गणित: राजस्थान में जो काम आधे दाम में वही यहाँ दोगुने रेट पर

छत्तीसगढ़ में डायल 112 का अजीब गणित: राजस्थान में जो काम आधे दाम में वही यहाँ दोगुने रेट पर

रायपुर। छत्तीसगढ़ में डायल 112 सेवा के नाम पर सरकारी खजाने को 150 करोड़ रुपए की चपत लगाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। गृह विभाग ने राजस्थान में काम कर रही जीवीके ईएमआरआई कंपनी को छत्तीसगढ़ में दोगुने रेट पर ठेका देने का फैसला किया है। ताज्जुब की बात यह है कि राजस्थान में यही कंपनी गाड़ी, ड्राइवर और डीजल खुद के खर्च पर देकर प्रति वाहन 66 हजार रुपए ले रही है। वहीं छत्तीसगढ़ सरकार अपनी गाड़ियां देने के बावजूद इसी कंपनी को सवा लाख रुपए महीना देने जा रही है। अफसरों की इस दरियादिली ने पूरे महकमे में हलचल मचा दी है और अब यह मामला मुख्य सचिव तक पहुंच गया है।

अफसरों ने बिछाया ऐसा जाल कि दूसरी कंपनियां बाहर हो गईं

इस पूरे खेल में टेंडर की शर्तें इस तरह बनाई गईं कि बाकी कंपनियां दौड़ से बाहर हो जाएं। टेंडर 3 अक्टूबर को निकाला गया और कंपनियों से साल 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट मांग ली गई। जबकि सरकार ने खुद ऑडिट की आखिरी तारीख 31 अक्टूबर तय कर रखी है। ऐसे में 99 फीसदी कंपनियां टेंडर नहीं भर पाईं क्योंकि उनकी बैलेंस शीट तैयार नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि 7 में से 5 कंपनियां तकनीकी कारणों से बाहर हो गईं और केवल दो कंपनियों के बीच मुकाबला दिखाकर जीवीके को 310 करोड़ का वर्क ऑर्डर थमा दिया गया।

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खर्च का हिसाब: राजस्थान में 1000 गाड़ियां और छत्तीसगढ़ में केवल 400

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राजस्थान में जीवीके कंपनी 1000 गाड़ियां चलाने के लिए साल भर में 94 करोड़ रुपए लेती है। इसमें गाड़ी की किश्त से लेकर मरम्मत तक सब कंपनी का है। छत्तीसगढ़ में सरकार केवल 400 गाड़ियों के संचालन के लिए ही 62 करोड़ रुपए हर साल लुटाने को तैयार है। पांच साल के इस ठेके में छत्तीसगढ़ सरकार राजस्थान के मुकाबले करीब 150 करोड़ रुपए ज्यादा चुकाएगी। विधायक सुशांत शुक्ला ने इस मामले में मुख्य सचिव से लिखित शिकायत कर आरोप लगाया है कि यह सब केवल एक खास कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है।

किसने क्या कहा

डायल 112 राजस्थान के नोडल ऑफिसर प्रेमदन ने बताया कि वहां कंपनी को गाड़ी, ड्राइवर और मरम्मत का खर्च खुद उठाना पड़ता है और सरकार तय रेट पर भुगतान करती है। वहीं जीवीके राजस्थान के पीआरओ भानू सोनी ने बताया कि उन्हें वहां 66 हजार और 90 हजार के दो अलग-अलग रेट पर काम मिला है। छत्तीसगढ़ के अपर मुख्य सचिव गृह मनोज पिंगुआ ने बताया कि हर राज्य में अलग मुकाबला होता है और जेम पोर्टल के नियमों के हिसाब से ही टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई है।

आंकड़ों में समझिये घोटाले का गणित

राजस्थान में एक गाड़ी का मासिक खर्च 66 हजार रुपए है जिसमें गाड़ी कंपनी की अपनी होती है। छत्तीसगढ़ में एक गाड़ी का खर्च 1.25 लाख रुपए तय किया गया है जबकि गाड़ी सरकार की है। राजस्थान में 1000 गाड़ियों का सालाना बजट 94 करोड़ है तो छत्तीसगढ़ में 400 गाड़ियों का बजट 62 करोड़ रुपए रखा गया है। यह पूरा मामला अब पुलिस मुख्यालय पहुंच चुका है और एक-दो दिन में डीजीपी दफ्तर से अंतिम मुहर लगने वाली है।

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