जल संसाधन विभाग में बड़ा टेंडर घोटाला, चहेते ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के लिए बदल दिए गए वर्षों की गणना के नियम

जल संसाधन विभाग में बड़ा टेंडर घोटाला, चहेते ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के लिए बदल दिए गए वर्षों की गणना के नियम

रायपुर। छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में एक बार फिर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और चहेते ठेकेदारों को उपकृत करने का मामला सामने आया है। ताजा मामला छुईखदान के कार्यपालन अभियंता द्वारा आमंत्रित निविदा सूचना क्रमांक 2SAC/2025-26 सिस्टम नंबर 173473 का है। इस टेंडर में मेसर्स गायत्री वेंचर्स को नियम विरुद्ध तरीके से पात्र घोषित कर एल-1 बना दिया गया है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किस दबाव या लालच में विभाग के आला अधिकारियों ने निविदा की बुनियादी शर्तों के साथ इतनी बड़ी छेड़छाड़ की।

शिकायत के अनुसार निविदा प्रपत्र की धारा 4.1ए में फिजिकल टर्नओवर के लिए पिछले पांच वर्षों की गणना में भारी गोलमाल किया गया है। यह टेंडर 11 अगस्त 2025 को आमंत्रित किया गया था। नियमानुसार और सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत पिछले पांच वर्षों की गणना वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक की जानी चाहिए थी। लेकिन अधिकारियों ने मेसर्स गायत्री वेंचर्स को सीधा लाभ पहुंचाने के लिए इस गणना को 2019-20 से 2023-24 तक कर दिया।

  इस बदलाव के पीछे की मुख्य वजह यह थी कि ठेकेदार द्वारा प्रस्तुत फिजिकल टर्नओवर का प्रमाण पत्र 30 जून 2019 का था।

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 अगर सही वित्तीय वर्षों की गणना की जाती तो ठेकेदार का यह पुराना प्रमाण पत्र स्वतः ही अमान्य हो जाता और वे टेंडर प्रक्रिया से बाहर हो जाते।

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एक विशेष ठेकेदार के पुराने दस्तावेज को वैध ठहराने के लिए पूरे निविदा की समय-सीमा को ही पीछे धकेल दिया गया।

यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि निविदा प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी बल्कि इसे एक विशेष फर्म को ठेका दिलाने के लिए ही डिजाइन किया गया था। वास्तविक और योग्य ठेकेदारों को दरकिनार कर एक अयोग्य फर्म को एल-1 घोषित करना न केवल अन्य ठेकेदारों के साथ अन्याय है बल्कि यह सरकारी खजाने को भी खतरे में डालने वाला कदम है। इस स्तर की धांधली बिना उच्च स्तर के संरक्षण के संभव नहीं है। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका इस मामले में पूरी तरह से संदिग्ध नजर आ रही है। अगर एक ठेकेदार के लिए टेंडर की तारीखों और वर्षों की गणना को इस तरह बदला जा सकता है तो यह जल संसाधन विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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