बिलासपुर DEO ऑफिस का 'प्रमोशन-पोस्टिंग' सिंडिकेट: हाई कोर्ट और DPI के आदेशों को रद्दी में डालकर चहेतों को बांटी मलाई

बिलासपुर DEO ऑफिस का 'प्रमोशन-पोस्टिंग' सिंडिकेट: हाई कोर्ट और DPI के आदेशों को रद्दी में डालकर चहेतों को बांटी मलाई

बिलासपुर।  छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में ट्रांसफर और पोस्टिंग का खेल कोई नई बात नहीं है, लेकिन बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय ने मनमानी और नियमों की अनदेखी का एक नया 'सिलेबस' ही तैयार कर लिया है। यहां सहायक शिक्षकों को प्रधान पाठक (HM) बनाने और उन्हें मनचाही जगह पर बिठाने के लिए एक ऐसा खेल खेला गया, जिसमें हाई कोर्ट और लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के स्पष्ट आदेशों को सीधे किनारे कर दिया गया। इस पूरे सिंडिकेट में आरोप सीधे तौर पर प्रभारी डीईओ विजय टांडे और कनिष्ठ लेखा परीक्षक सुनील यादव पर लग रहे हैं।

डीपीआई ने खारिज किया, लेकिन डीईओ का दिल पसीज गया!

पूरा मामला 27 दिसंबर 2024 को तत्कालीन डीईओ टीआर साहू द्वारा जारी प्रमोशन आदेशों से जुड़ा है। काउंसलिंग में मनचाही जगह न मिलने पर कुछ शिक्षक हाई कोर्ट पहुंचे। हाई कोर्ट ने 16 अप्रैल 2025 को मामले का नियमानुसार निराकरण करने के लिए इसे डीपीआई के पास भेज दिया। डीपीआई ने 4 सितंबर 2025 को जांच के बाद स्पष्ट आदेश जारी किया कि सभी अभ्यावेदन अमान्य हैं और पुरानी पदस्थापना (पूर्व दिशा-निर्देशों के अनुसार) ही लागू रहेगी।

लेकिन, शायद बिलासपुर डीईओ ऑफिस का अपना एक अलग ही 'संविधान' चलता है, जहां रायपुर से आए डीपीआई के सख्त आदेशों से ज्यादा वजन चहेतों की सिफारिशों में होता है।

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बिना काउंसलिंग के 'VIP' पोस्टिंग का खेल

डीपीआई के आदेशों को धता बताते हुए, डीईओ कार्यालय ने नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को शहर के आस-पास के सुविधाजनक स्कूलों में सेट कर दिया। यह सब बिना किसी काउंसलिंग के गुपचुप तरीके से किया गया:

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 हलधर साहू: इन्हें खोंगसरा (कोटा) जाना था, लेकिन नियमों को 'बायपास' कर सीधे शहर के करीब राजेंद्र नगर में पोस्टिंग दे दी गई।

 शिप्रा बघेल: खमरिया (मस्तूरी) की जगह पौसरा (बिल्हा) में सेट कर दी गईं।

 सूरज कुमार सोनी: पुरेना (तखतपुर) के बजाय भटगांव (बिल्हा) का 'उपहार' दे दिया गया।

डेडलाइन खत्म, फिर भी बंटती रहीं रेवड़ियां

सरकारी नियम बेहद स्पष्ट है कि प्रमोशन आदेश जारी होने के 10 दिन के भीतर नई जगह पर जॉइन करना होता है, वरना पदस्थापना स्वतः निरस्त मानी जाती है। लेकिन बिलासपुर के इस 'पोस्टिंग मेले' में वैधता खत्म होने के बाद भी कई शिक्षकों को संशोधित आदेश जारी कर मलाईदार और मनचाही जगह पर बिठाया गया।

एक्सपायर वेटिंग लिस्ट में फूंक दी 'जान'

सिर्फ ट्रांसफर ही नहीं, प्रमोशन में भी जादूगरी दिखाई गई। नियमों के तहत डीपीसी (DPC) और वेटिंग लिस्ट की वैधता सिर्फ एक साल होती है। यह मियाद पहले ही खत्म हो चुकी थी, फिर भी करीब 15 दिन पहले एक नया आदेश निकालकर 'एक्सपायर' हो चुकी वेटिंग लिस्ट के 5 शिक्षकों— टंकेश्वर जगत, आस्था गौरहा, फुलेश सिंह, हेमलता पटेल और ईश्वरी ध्रुव— को प्रधान पाठक के पद पर बैठा दिया गया।

इतने बड़े गड़बड़झाले और नियमों की खुली धज्जियां उड़ने के बाद प्रभारी डीईओ विजय टांडे का बयान बेहद दिलचस्प है। उनका कहना है, "सबकुछ नियम से हुआ है। शिक्षकों ने अवमानना याचिका लगाई थी, इसलिए कोर्ट के आदेश पर पोस्टिंग की गई है। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है।" अब यक्ष प्रश्न यह है कि जब डीपीआई खुद 4 सितंबर 2025 को सारी आपत्तियां खारिज कर पुरानी जगह पर पोस्टिंग का आदेश दे चुका था, तो बिलासपुर डीईओ ऑफिस किस 'गुप्त नियम' के तहत बिना काउंसलिंग ये वीआईपी पोस्टिंग बांट रहा था? फिलहाल, इस 'प्रमोशन-पोस्टिंग सिंडिकेट' की फाइलें चीख-चीख कर उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रही हैं।

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