सीएम हेल्पलाइन का खेल: खुद की शिकायत की जांच खुद ही कर रहे अफसर, प्रार्थी को हेल्पलाइन से कॉल आया,क्या आप संतुष्ट है, इधर साहब का 42 लाख का फर्जी मेडिकल बिल पास; अंबिकापुर में 80 लाख का बंगला 

सीएम हेल्पलाइन का खेल: खुद की शिकायत की जांच खुद ही कर रहे अफसर, प्रार्थी को हेल्पलाइन से कॉल आया,क्या आप संतुष्ट है, इधर साहब का 42 लाख का फर्जी मेडिकल बिल पास; अंबिकापुर में 80 लाख का बंगला 

रायपुर। छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में इन दिनों सिस्टम का अपना ही अलग ही खेल चल रहा है। मामला जगदलपुर में पदस्थ प्रभारी अधीक्षण अभियंता (एसी) और टी.डी.पी.पी. संभाग के कार्यपालन अभियंता वेदप्रकाश पांडेय का है। जुलाई-अगस्त 2025 में इन्होंने माता-पिता के इलाज के नाम पर 42 लाख रुपये के मेडिकल बिल लगा दिए। अब प्रश्न यह है कि 16 साल की सरकारी नौकरी में 42 लाख रुपये की इतनी बड़ी बचत आखिर कैसे हो गई?

अंबिकापुर में 80 लाख का मकान समझें पूरा गणित

नौकरी के सालों में करोड़ों के वारे-न्यारे की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। करीब 6 वर्ष पूर्व वेद प्रकाश पांडेय ने अंबिकापुर की वसुंधरा विहार कॉलोनी में लगभग 80 लाख रुपये कीमत का मकान खरीदा था। इनकी पहली पोस्टिंग वर्ष 2009 में हुई थी। सरकारी नियमानुसार है  किसी भी कर्मचारी को 2 लाख रुपये से ऊपर के भुगतान या संपत्ति खरीदी पर सरकार से अनुमति लेनी होती है और अपनी बचत का पूरा विवरण भी विभाग को देना होता है। मगर श्री पांडेय ने इस नियम को भी किनारे रख दिया। क्या इस 80 लाख के मकान और 42 लाख के मेडिकल बिल की जानकारी इनकम टैक्स विभाग को दी गई थी? यदि यह भुगतान बचत से किया जा रहा है, तो शासन को इसका संपूर्ण विवरण क्यों नहीं दिया गया?

पेंशनर पिता को बना दिया आश्रित

नियम-कायदों की अनदेखी का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। वेद प्रकाश पांडेय के पिता मध्य प्रदेश के रीवा में वन विभाग में तृतीय श्रेणी के शासकीय कर्मचारी थे। वे बकायदा पेंशनर हैं। सरकारी नियम के मुताबिक, जो माता-पिता खुद सरकारी पेंशन ले रहे हों, वे बेटे पर आश्रित नहीं हो सकते। इसके बावजूद उनके नाम पर मुंबई के नामी ब्रीच कैंडी अस्पताल का पर्चा लगाकर 42 लाख का बिल पास कराने की फाइल चल पड़ी।

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खुद की चोरी, खुद ही जांचकर्ता

इस फर्जीवाड़े की शिकायत अंबिकापुर के पत्रकार ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में की थी। बीते 25 अगस्त को हेल्पलाइन से शिकायतकर्ता के पास फोन बजता है। उधर से पूछा जाता है कि शिकायत की जांच अधीक्षण अभियंता (सिंचाई विभाग) को सौंप दी गई है, क्या आप संतुष्ट हैं? यानी जिसके खिलाफ 42 लाख के बिल निकालने की शिकायत है, सरकार ने उसी अफसर के हाथ में जांच की फाइल पकड़ा दी है। खुद की चोरी की जांच खुद ही करो और अपने आप को बाइज्जत बरी कर लो।

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सत्ता कोई भी हो, रसूख कम नहीं होता

 

सात महीने से यह शिकायत दफ्तरों में धूल खा रही है। बीते मार्च में ईओडब्ल्यू (EOW) की टीम ने कार्यालय में छापा मारा था और तमाम दस्तावेज भी जब्त किए थे। पर बीच में कुछ ऐसी तगड़ी सेटिंग जमी कि फाइल ही कहीं गुम हो गई। अफसर की पहुंच इतनी ऊपर तक है कि पिछली सरकार में मंत्रियों की सिफारिशें दरकिनार कर दी गई थीं, लेकिन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की लिखी चिट्ठी पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इन्हें 10 साल के अनुभव का हवाला देकर गरियाबंद में मनचाही पोस्टिंग दे दी थी।

बिना स्वीकृति 67 करोड़ का भुगतान बिना अनुमति शीश महल भी....

 

सिस्टम से खिलवाड़ करने का उनका यह कोई पहला मामला नहीं है। टी.डी.पी. संभाग में पदस्थापना के दौरान भी बिना किसी तकनीकी या वित्तीय स्वीकृति के 28 पीस वर्क में 67 करोड़ रुपये का भुगतान करा दिया गया था। वित्त विभाग से ऐसी सांठगांठ रही कि करोड़ों रुपये आसानी से पार हो गए। इसके अलावा जगदलपुर की बोधघाट कॉलोनी में बिना सरकारी अनुमति के 12 कमरों का आलीशान 'शीश महल' जैसा सरकारी आवास भी तान दिया गया है।

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