दंतेवाड़ा का पेपर माइन घोटाला: 9 साल तक बिना खोदे निकल गया 2.72 लाख टन लौह अयस्क, सिस्टम की आंखों में धूल या मिलीभगत?
रायपुर। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा स्थित अलनार लौह अयस्क खदान का मामला अब महज एक थाने की शिकायत भर नहीं रह गया है, बल्कि यह बस्तर में चल रहे भूतिया माइनिंग (कागजी खनन) के एक बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा कर रहा है। सवाल अब यह नहीं है कि खदान में खनन क्यों नहीं हुआ; बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यह है कि जब बीते 9 सालों में खदान के भीतर एक फावड़ा तक नहीं चला, तो फिर 2 लाख 72 हजार टन लौह अयस्क का उत्पादन और परिवहन कागजों पर कैसे हो गया? आखिर वो कौन सी 'जादुई मशीनें' और अदृश्य ट्रक थे, जो बिना जमीन खोदे खनिजों की सप्लाई कर रहे थे?
कागजों पर दौड़ते ट्रक और फर्जीवाड़े का सिंडिकेट
बस्तरिया राज मोर्चा द्वारा किरंदुल थाने में दर्ज कराई गई शिकायत ने खनन महकमे और प्रशासनिक मॉनिटरिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है। मोर्चा का सीधा आरोप है कि खदान संचालक कंपनी ने फर्जी ट्रांजिट पास (टीपी) और दस्तावेजों में भारी हेरफेर कर शासन को करोड़ों के राजस्व का चूना लगाया है। यह एक ऐसा संगठित घोटाला प्रतीत होता है, जिसमें 'कागजी परिवहन' के जरिए खनिज का बड़ा काला कारोबार संचालित किया गया। मोर्चा ने अब कंपनी प्रबंधन के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और फर्जी दस्तावेज तैयार करने जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर की मांग की है।
आदिवासियों के हक पर सीधा डाका
बस्तर में हर खदान के पीछे स्थानीय विकास और रोजगार का तर्क दिया जाता है, लेकिन अलनार का सच इसके ठीक उलट है। इस पूरे फर्जीवाड़े में सबसे बड़ा धोखा उन भोले-भाले आदिवासियों के साथ हुआ है, जिन्हें रोजगार के सपने दिखाए गए थे। पेसा (PESA) कानून, वन अधिकार अधिनियम और ग्राम सभा के विशेषाधिकारों को सरेआम दरकिनार किया गया। जब खदान जमीन पर चली ही नहीं, तो स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता भी कैसे? यह सिर्फ लाल सोने (लौह अयस्क) की नहीं, बल्कि आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की भी 'कागजी लूट' है।
सवालों के घेरे में 'सरकारी सिस्टम
क्या इतना बड़ा फर्जीवाड़ा बिना प्रशासनिक संरक्षण और मिलीभगत के संभव है? 2.72 लाख टन लौह अयस्क के परिवहन के लिए हजारों ट्रकों के ट्रिप की जरूरत होती है। माइनिंग विभाग, वन विभाग और पुलिस के चेकपोस्ट पर इन 'कागजी ट्रकों' की चेकिंग कभी क्यों नहीं हुई? 9 साल तक रॉयल्टी और प्रोडक्शन की जो फाइलें सरकारी दफ्तरों में दौड़ती रहीं, उन पर किन अफसरों ने आंखें मूंद कर मुहर लगाई?
दंतेवाड़ा में अब इस मुद्दे ने भारी राजनीतिक और सामाजिक तूल पकड़ लिया है। बस्तरिया राज मोर्चा ने अल्टीमेटम दे दिया है।
