रायपुर चिकित्सा शिक्षा विभाग में बड़ा खेल, नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को फायदा पहुंचाने की कोशिश, करोड़ो की विवादित निविदा पर कार्यवाही नहीं...

रायपुर चिकित्सा शिक्षा विभाग में बड़ा खेल, नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को फायदा पहुंचाने की कोशिश, करोड़ो की विवादित निविदा पर कार्यवाही नहीं...

रायपुर।छत्तीसगढ़ के चिकित्सा शिक्षा विभाग में करीब 100 करोड़ रुपए की मैनपावर सप्लाई निविदा का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस टेंडर में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई थीं। मामला कोर्ट तक भी पहुंचा लेकिन कई सप्ताह बीत जाने के बाद भी विभागीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसा लगता है कि जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है और अफसर इस पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी में हैं।

क्या है पूरा विवाद और गड़बड़ी का खेल

इस निविदा की शर्तों को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठ रहे थे। राष्ट्रीय जगत पहल पड़ताल में यह बात सामने आई है कि टेंडर की पात्रता और वित्तीय शर्तें इस तरह से तय की गईं जिससे राज्य की स्थानीय एजेंसियां दौड़ से बाहर हो जाएं। किसी खास बाहरी एजेंसी को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को बदला गया। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला मामला अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट यानी ईएमडी राशि का है। नियमानुसार 100 करोड़ रुपए की निविदा के लिए ईएमडी की राशि कम से कम 1 करोड़ रुपए होनी चाहिए थी। अफसरों ने अपनी पसंदीदा एजेंसी को राहत देने के लिए इसे घटाकर सिर्फ 6 लाख रुपए कर दिया। इतनी बड़ी रियायत देने के पीछे क्या मंशा थी इसका जवाब कोई जिम्मेदार अधिकारी नहीं दे पा रहा है।

केंद्र के नियमों की अनदेखी, जेम पोर्टल को नकारा

केंद्र सरकार का साफ निर्देश है कि शासकीय विभागों में मैनपावर और अन्य सेवाओं की खरीदी जेम पोर्टल के माध्यम से होनी चाहिए। जेम पोर्टल से टेंडर होने पर पारदर्शिता रहती है और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम हो जाती है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने केंद्र के इन सख्त निर्देशों को भी नजरअंदाज कर दिया। जेम पोर्टल के बजाय ऑफलाइन या मनमाने तरीके से निविदा प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया ताकि चहेतों को उपकृत किया जा सके।

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जांच रिपोर्ट दबाने की कोशिश, अधिकारी मौन

शिकायतें बढ़ने और मामला मीडिया में आने के बाद विभाग ने जांच कराने और नियमानुसार कार्रवाई करने का आश्वासन दिया था। कई सप्ताह का समय बीत चुका है लेकिन जांच की स्थिति क्या है यह कोई नहीं बता रहा है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि जांच पूरी हो चुकी है लेकिन रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। बड़ी रसूखदार कंपनियों के दबाव में पूरी फाइल को दबाने का प्रयास चल रहा है ताकि दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों को बचाया जा सके। इस मामले में जब विभाग के आला अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कुछ भी कहने से साफ मना कर दिया।

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