सर्पदंश घोटाला: फाइलों में सांप और सिस्टम में सपेरे; 2 सिपाही और 3 बाबू अंदर, 'साहबों' की तलाश जारी
बिलासपुर।सांप के काटने से इंसान की जान जाती है, लेकिन हमारे सिस्टम में सांप काटने से कुछ खास लोगों की जेबें भरती हैं। बिलासपुर के चर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले में जांच की आंच अब तहसील दफ्तर से छलककर अस्पताल की पुलिस चौकी तक जा पहुंची है। मुआवजे की हेराफेरी के आरोप में पुलिस ने तीन राजस्व लिपिकों (बाबुओं) और सिम्स पुलिस चौकी के दो सिपाहियों को धर दबोचा है। अब इन गिरफ्तारियों पर कर्मचारी संगठन भड़क उठे हैं। सोमवार को लिपिक संघ ने कलेक्ट्रेट और एसपी दफ्तर पर प्रदर्शन कर बता दिया कि पुलिस सिर्फ 'छोटी मछलियों' को जाल में फंसा रही है, जबकि फाइल पर असली मुहर लगाने वाले 'मगरमच्छ' अभी भी साफ पानी में मजे से तैर रहे हैं।
मुर्दाघर की अपनी 'फास्ट-ट्रैक' सर्विस
इस खेल में पुलिस की भूमिका भी गजब रही है। जांच में खुलासा हुआ कि सिम्स चौकी में तैनात रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर, हीरा खांडे गिरोह के लिए एक तरह से 'कस्टमर केयर' का काम कर रहे थे। शव जैसे ही पोस्टमार्टम के लिए सिम्स पहुंचता, ये दोनों तुरंत गिरोह के मुंशी महेंद्र मनहर को फोन खड़का देते। मानो कोई इमरजेंसी सर्विस चल रही हो। खबर मिलते ही मनहर अस्पताल पहुंचता और रोते-बिलखते परिवार को सरकारी राहत राशि का ऐसा लालच देता कि वे मौत की असली वजह भूलकर उसे 'सांप का काटना' बताने को राजी हो जाते। बदले में मुआवजे की मलाई का एक बड़ा हिस्सा गिरोह डकार जाता था।
बाबू अंदर, तो 'साहब' बाहर क्यों?
तहसील के तीन कर्मचारियों- नरेंद्र कुमार कौशिक, हरिशंकर राठौर और गरीबराम बिंझवार की गिरफ्तारी ने नई बहस छेड़ दी है। लिपिक संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी का दर्द छलक कर बाहर आया। उनका कहना है कि तीनों को बयान के नाम पर थाने बुलाया गया और बिना किसी नोटिस के दो-तीन दिन खातिरदारी कर सीधे जेल भेज दिया गया। संघ ने ज्ञापन देकर एक वाजिब सवाल दागा है जब लिपिक का काम सिर्फ फाइल आगे बढ़ाना है, तो उन्हें ही बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है?
लंबी प्रक्रिया, फिर भी हो गया 'खेल
कर्मचारी संघ ने पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया समझाते हुए बताया कि सांप काटने से मौत पर पहले एफआईआर होती है। फिर पंचनामा, पोस्टमार्टम, पटवारी का मुआयना, राजस्व निरीक्षक और नायब तहसीलदार की जांच... और आखिर में तहसीलदार या एसडीएम की मुहर। इतनी लंबी-चौड़ी चेकपोस्ट पार करने के बाद ही मुआवजा पास होता है। संघ का तर्क है कि जब इतनी लंबी कतार में बैठे बड़े अफसरों की नजरों से फाइल गुजरी, तो फिर सारा दोष सिर्फ बाबुओं के सिर कैसे मढ़ दिया गया? तहसील के बाकी कर्मचारियों में भी दहशत है कि अगला नंबर किसका होगा।
एसएसपी का दावा- बचेंगे नहीं बड़े चेहरे
पुलिस 2019 से फरवरी 2024 तक बंटे सर्पदंश मुआवजे की फाइलें खंगाल रही है। अब तक 16 मामलों में एफआईआर और 15 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। इस शानदार 'नेटवर्क' में वकील हीरा खांडेकर, मुंशी मनहर, बैंककर्मी आशीष, वकील कांत साहू, डॉक्टर प्रियंका सोनी और ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा की पूरी एक टीम काम कर रही थी। ड्राइवर गोविंद के खाते में पांच लाख का लेनदेन मिला है। एक और डॉक्टर की तलाश है, जो जाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाने में माहिर बताया जा रहा है।
एसएसपी रजनेश सिंह ने कहा है कि जो पकड़े गए हैं, वे तो सिर्फ मोहरे हैं। असली मास्टरमाइंड तक पुलिस जल्द पहुंचेगी। यह पूरा खेल इतनी शानदार प्लानिंग से चल रहा था कि झूठा पंचनामा और फर्जी रिपोर्ट घर बैठे बन जाती थी। एसएसपी ने कहा है कि सारी रिपोर्ट कलेक्टर को दी जाएगी। अब देखना दिलचस्प होगा कि जिन बड़ी मछलियों की तलाश पुलिस कर रही है, वे कभी जाल में फंसती भी हैं, या हमेशा की तरह 'पानी गहरा' बताकर फाइल बंद कर दी जाती है।
