आबकारी विभाग का गजब खेल: जिस शराब को नाली में बहाना था, उसे बाजार में पिला दिया! कमिश्नर साहब बेबस या 'कमीशन' का पेंच?
रायपुर। छत्तीसगढ़ का आबकारी सिस्टम भी गजब है। यहां वो शराब भी आसानी से बाजार में बिक जाती है, जिसे कागजों पर नष्ट कर दिया गया हो। भई, इसे ही तो असली मैजिक कहते हैं! पूरा मामला रायपुर के सिलतरा वेयरहाउस का है। जहां अधिकारियों को आदेश तो मिला था कि खराब शराब की बोतलों को नष्ट करना है, लेकिन वेयरहाउस के जानकारों ने सोचा- इसे नाली में क्यों बहाना, जब इससे अपनी और अपनों की जेबें भरी जा सकती हैं!
पड़ताल में जो बातें सामने आई हैं, वो किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं हैं। आबकारी विभाग ने 12 मई 2026 को बकायदा 7,509 बॉक्स में रखी 3,566 बोतलों को नष्ट करने का आदेश जारी किया था। लेकिन नष्ट करने से किसे क्या फायदा होता? सो इनमें से आधी से ज्यादा बोतलों को चुपचाप वेयरहाउस से बाहर निकाल कर बाजार में खपा दिया गया। जब थोड़ा बवाल मचा और शिकायतें हुईं, तो बस डैमेज कंट्रोल के लिए सिलतरा वेयरहाउस प्रभारी दीप मसीह को वहां से हटा दिया गया।
नियमों की आड़ में मलाई खाने का सिस्टम
सरकारी नियमों का फायदा कैसे उठाना है, ये कोई इन अधिकारियों से सीखे। सरकार शराब ट्रांसपोर्टिंग में संभावित टूट-फूट के लिए 0.25 प्रतिशत की छूट देती है। अब खेल ये होता है कि ट्रक से शराब आती है, और कागजों पर बोतलों को 'टूटा हुआ' दिखा दिया जाता है। सरकार बेचारी नुकसान सहती है, सप्लायर को पूरा पेमेंट मिल जाता है और वो "टूटी हुई" बोतलें असल में कोचियों के जरिए ब्लैक मार्केट में फुल रेट पर बिक जाती हैं।
इसके अलावा एक 180 दिन वाला नियम भी है। 6 महीने तक अगर किसी गोदाम में शराब नहीं बिकी, तो उसे सरप्लस स्टॉक मानकर सप्लायर कंपनी पर एमआरपी के हिसाब से फाइन (डेमरेज चार्ज) लगा दिया जाता है। इस भारी भरकम जुर्माने से बचने के लिए कंपनियां और वेयरहाउस के कर्मचारी मिलकर इस स्टॉक को पिछले दरवाजे से बाहरी लोगों के जरिए निकाल देते हैं। कंपनी का स्टॉक क्लियर और अधिकारियों की अवैध कमाई शुरू। यानी दोनों हाथों में लड्डू!
भ्रष्टाचार देखकर कैमरे भी हो जाते हैं अंधे
पाली-तानाखार के विधायक तुलेश्वर हीरा सिंह मरकाम ने तो विधानसभा के अंदर इस पूरे फर्जीवाड़े की पोल खोल दी थी। उनका सीधा आरोप है कि सिलतरा विदेशी शराब गोदाम में राजनीतिक रसूख और बड़े अधिकारियों के संरक्षण में हर महीने करोड़ों रुपयों का खेल चल रहा है।
सबसे मजेदार बात ये है कि जब भी शराब की हेराफेरी करनी होती है, गोदाम के सीसीटीवी कैमरे अपने आप बंद कर दिए जाते हैं। शायद कैमरे भी भ्रष्टाचार देखकर शर्म से आंखें मूंद लेते होंगे! विधायक जी ने तो साफ आरोप लगाया कि वेयरहाउस की प्रभारी एक भाजपा नेता की पत्नी हैं, इसलिए उन पर हाथ डालने से सब बचते हैं। इसके अलावा गोदाम में काम करने वाले मजदूरों की संख्या भी कागजों पर ज्यादा दिखाकर अतिरिक्त राशि का बंदरबांट किया जा रहा है।
कमिश्नर साहब एल्मा की बेबसी का राज क्या है?
अब आते हैं आबकारी विभाग के कमिश्नर पी.एस. एल्मा साहब पर। मीडिया के सामने एल्मा साहब रटा-रटाया बयान देते हैं कि शराब बेचना गंभीर मामला है, इसकी जांच कराई जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन सवाल ये है कि आखिर कमिश्नर साहब से अपनी ही कमिशनरी क्यों नहीं संभल रही?
उनके ही विभाग के अधिकारी उनके आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, खुलेआम भ्रष्टाचार में डुबकी लगा रहे हैं, साहब आरोपों को स्वीकार भी करते हैं, लेकिन मजाल है कि किसी पर कोई ठोस कार्रवाई कर पाएं! आखिर इस बेबसी के पीछे राज क्या है? क्या इन भ्रष्टाचार में डूबे अधिकारियों के सिर पर सफेदपोश बड़े नेताओं का संरक्षण है, जिनका फोन आते ही कार्रवाई करने से पहले साहब के हाथ-पांव फूल जाते हैं? या फिर सारा खेल कमीशन का ही है?
चाहे वो कवर्धा का मामला हो या सिलतरा का, हर जगह बस गोलमोल ही चल रहा है। खैर, इंतजार कीजिए, इन सफेदपोशों और भ्रष्ट सिस्टम के गठजोड़ का बहुत जल्द एक और बड़ा खुलासा होगा!
