2549 करोड़ के टेंडर में खेल: मुख्य सचिव की बैठक के बाद गुपचुप जोड़ी गई शर्त, हाईकोर्ट पहुंचा मामला
बिलासपुर। प्रदेश में 2549 करोड़ रुपये की जल आपूर्ति और निर्माण से संबंधित सीकासेर कोडार लिंक योजना का टेंडर एक नए विवाद में घिर गया है। मुख्य सचिव की 64वीं कार्यकारिणी बैठक में इस योजना के निविदा की कंडिका नंबर 1.3(B) का उल्लेख कहीं नहीं था। आरोप है कि मुख्य सचिव की कार्यकारी समिति की बैठक समाप्त होने के उपरांत इस हिस्से को निविदा में अलग से जोड़ दिया गया। निविदा प्रक्रिया की इसी विसंगति और अन्य गड़बड़ियों को लेकर मेसर्स ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में पुनर्विचार याचिका दायर करने की पूरी तैयारी कर ली है।
इस प्रस्तावित याचिका के जरिए अब 10 अगस्त 2026 को दिए गए हाईकोर्ट के आदेश (WPC नंबर 4026/2026) को चुनौती दी जाएगी। याचिकाकर्ता का पक्ष है कि निविदा (NIT नंबर 01/SAC/2026-27) की अनिवार्य शर्तों को दरकिनार करते हुए एक रसूखदार कंपनी को अनुचित लाभ दिया गया और उसे L-1 घोषित किया गया।
याचिका के ड्राफ्ट में टेंडर की शर्त 3.8(a) के उल्लंघन का जिक्र है। इस शर्त में जॉइंट वेंचर (JV) की भागीदारी पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। इसके बावजूद, टेंडर मूल्यांकन समिति ने प्रतिवादी क्रमांक 5 को मध्य प्रदेश जल निगम के एक पुराने प्रोजेक्ट के आधार पर पात्र मान लिया। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश किए जाने वाले दस्तावेजों, जिनमें एमपी जल निगम का 26 मई 2026 का सर्टिफिकेट और 2022 का पत्र शामिल है, के अनुसार वह काम 'DBL-SIPL (JV)' द्वारा किया गया था। इस जेवी में संबंधित कंपनी की हिस्सेदारी केवल 65 प्रतिशत थी। याचिका में यह तर्क रखा जाएगा कि निविदा में जेवी पर रोक के रहते हुए 65 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले काम को 100 प्रतिशत निजी अनुभव मानकर टेंडर देना नियमों का खुला उल्लंघन है।
अदालत ने अपने 4 अगस्त के फैसले (पैरा 46 और 52) में पुराने अनुभव की जांच को टेंडर समिति के अधिकार क्षेत्र में माना था। प्रस्तावित याचिका में दलील तैयार की गई है कि यह कोई तकनीकी या जटिल इंजीनियरिंग जांच का विषय नहीं है। यह निविदा दस्तावेजों में दर्ज शर्तों के पालन का मामला है। जब कागजों पर जेवी की मनाही है, तो समिति उसे मान्यता कैसे दे सकती है। इस आधार पर पूरे प्रकरण की जांच वर्तमान समिति से वापस लेकर वरिष्ठ अधिकारियों की अध्यक्षता वाली एक स्वतंत्र जांच समिति को सौंपने की मांग रखी गई है।
वित्तीय शर्तों को लेकर भी विरोधाभास की स्थिति बनी हुई है। निविदा के क्लॉज 1.3(a) के अंतर्गत 1,019.94 करोड़ रुपये की वित्तीय क्षमता अनिवार्य की गई है। वहीं, क्लॉज 1.3(b) में यह शर्त रखी गई है कि कंपनी का औसत सालाना टर्नओवर 5,099.72 करोड़ रुपये होना चाहिए। यह राशि पूरी परियोजना की मूल लागत से भी दोगुनी है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि मुख्य सचिव की बैठक के बाद गुपचुप तरीके से जोड़ी गई इस 1.3(b) कंडिका और 1.3(a) को एक साथ लागू करने से प्रतिस्पर्धा खत्म होती है। न्यायसंगत प्रक्रिया के लिए इन्हें एक-दूसरे के विकल्प के तौर पर देखा जाना चाहिए।
प्रस्तावित याचिका में अदालत से चार प्रमुख मांगें की जाएंगी। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी की तकनीकी पात्रता रद्द कर उसे टेंडर प्रक्रिया से बाहर किया जाए। दस्तावेजों और मूल्यांकन प्रक्रिया की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय और स्वतंत्र समिति का गठन हो। 30 महीने के निर्माण कार्य और 5 साल के मेंटेनेंस के लिए एक ही कंपनी की जवाबदेही तय करने के लिए जेवी अनुभव वाले को काम न सौंपा जाए। टेंडर की वित्तीय शर्तों (1.3a और 1.3b) की व्यावहारिक व्याख्या की जाए जिससे निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।
