जब सिस्टम नहीं बना सका रास्ता, ग्रामीणों ने खुद संभाली कमान! चंदा जुटाया, श्रमदान किया और बना डाला आवागमन का रास्ता

जब सिस्टम नहीं बना सका रास्ता, ग्रामीणों ने खुद संभाली कमान! चंदा जुटाया, श्रमदान किया और बना डाला आवागमन का रास्ता

रसेला। गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड से ग्रामीणों की एकजुटता और आत्मनिर्भरता की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो व्यवस्था के सामने कई सवाल भी खड़े करती है। वर्षों से आवागमन की समस्या झेल रहे राजपुर और धर्मपुर गांव के लोगों ने सरकारी इंतजार छोड़कर खुद ही रास्ता बनाने का फैसला किया। ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाया, श्रमदान किया और लंबे समय से बाधा बने कोंगालबाहरा नाला के पास आवागमन के लिए रास्ता तैयार करने में जुट गए। यह पहल सिर्फ एक रास्ता बनाने की कहानी नहीं है, बल्कि उन ग्रामीणों की मजबूरी की तस्वीर है, जिन्हें रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी खराब और जोखिम भरे रास्तों पर निर्भर रहना पड़ता था।

चार किलोमीटर की दूरी के लिए करना पड़ता था 15 KM का सफर
ग्रामीणों के मुताबिक कोंगालबाहरा नाला लंबे समय से टेंगनाबासा-सिवनी मार्ग पर आवागमन में बड़ी बाधा बना हुआ है। छुरा ब्लॉक मुख्यालय की दूरी सीधी सड़क से करीब चार से पांच किलोमीटर के आसपास है, लेकिन नाले पर पर्याप्त रास्ता या पुल की सुविधा नहीं होने के कारण लोगों को दूसरे मार्ग से घूमकर लगभग 15 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था।  बारिश के मौसम में परेशानी कई गुना बढ़ जाती थी। नाले में पानी बढ़ने के बाद आवाजाही मुश्किल हो जाती थी और कई बार लोगों को जरूरी काम तक टालने पड़ते थे। ग्रामीणों के लिए यह समस्या सिर्फ दूरी बढ़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इलाज, पढ़ाई, बाजार और अन्य जरूरी कामों तक पहुंच भी इससे प्रभावित होती थी।

इंतजार लंबा हुआ तो ग्रामीणों ने खुद उठाया फावड़ा
लगातार परेशानी झेलने के बाद राजपुर और धर्मपुर के ग्रामीणों ने तय किया कि अब सिर्फ सरकारी व्यवस्था के भरोसे नहीं बैठा जा सकता। इसके बाद लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग देना शुरू किया और काम में खुद भी जुट गए। किसी ने चंदा दिया तो किसी ने मौके पर पहुंचकर श्रमदान किया। देखते ही देखते ग्रामीणों की सामूहिक मेहनत से नाले के आसपास आवागमन योग्य रास्ता तैयार करने का काम आगे बढ़ने लगा।

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दर्जनों ग्रामीणों ने मिलकर संभाली जिम्मेदारी
इस अभियान में दोनों गांवों के कई ग्रामीणों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। बिसाहू राम सिन्हा, देवलाल सिन्हा, खमंसिह ठाकुर, केलसिंह ठाकुर, सालिक राम सिन्हा, कुंजलाल ठाकुर, दुलार ठाकुर, ईश्वर सिंह ठाकुर, लवकुश नायक, निरंजन सिंह ध्रुव, संतुराम कमार, चम्पेश्वर साहू, नितेश ध्रुव, राकेश यादव, अजय तावड़े, नंद कुमार साहू, पुष्पराज कुमार और टिकट ध्रुव सहित अन्य ग्रामीणों ने आर्थिक सहयोग और श्रमदान के जरिए रास्ता बनाने में योगदान दिया। ग्रामीणों की यह पहल बताती है कि जब सामूहिक जरूरत सामने हो तो गांव के लोग अपने स्तर पर भी समाधान तलाश सकते हैं। हालांकि, इससे क्षेत्र की मूल समस्या खत्म नहीं हुई है।

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ग्रामीणों ने साफ कहा- रास्ता नहीं, पक्का पुल चाहिए
ग्रामीणों द्वारा तैयार किया जा रहा रास्ता तात्कालिक राहत का जरिया है। लोगों का कहना है कि यह स्थायी समाधान नहीं है। बारिश के मौसम में नाले में पानी बढ़ने पर फिर वही समस्या खड़ी हो सकती है। ग्रामीणों की मुख्य मांग कोंगालबाहरा नाला पर मजबूत और स्थायी पुल बनाने की है। उनका कहना है कि पुल बनने से न केवल राजपुर और धर्मपुर बल्कि आसपास के गांवों को भी सालभर सुरक्षित और सीधा आवागमन मिल सकेगा।

ग्रामीणों की मेहनत ने व्यवस्था के सामने छोड़ा सवाल
ग्रामीणों ने अपने संसाधनों से रास्ता तैयार कर दिया, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या उनकी यह मेहनत स्थायी समाधान में बदलेगी? वर्षों से पुल की जरूरत महसूस होने के बावजूद यदि ग्रामीणों को खुद चंदा और श्रमदान से रास्ता तैयार करना पड़े, तो यह ग्रामीण सड़क और पुल निर्माण की व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़ा करता है। अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी पहल प्रशासन तक पहुंचेगी और कोंगालबाहरा नाला पर स्थायी पुल निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाया जाएगा।

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