42 लाख के मेडिकल बिल का खेल: पिता पेंशनर, फिर भी बेटे के आश्रित; और शिकायत की जांच भी खुद आरोपी अफसर के पास

42 लाख के मेडिकल बिल का खेल: पिता पेंशनर, फिर भी बेटे के आश्रित; और शिकायत की जांच भी खुद आरोपी अफसर के पास

रायपुर l छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में इन दिनों सिस्टम का अपना ही अलग गणित चल रहा है। जगदलपुर में पदस्थ प्रभारी अधीक्षण अभियंता (एसी) और टी.डी.पी.पी. संभाग के कार्यपालन अभियंता वेदप्रकाश पांडेय ने जुलाई-अगस्त 2025 में अपने माता-पिता के इलाज के नाम पर लगभग 42 लाख रुपये के फर्जी मेडिकल बिल लगा दिए। अब प्रश्न यह है कि केवल 16 साल की शसकीय सेवा में 42 लाख रुपये की बड़ी बचत आखिर कैसे हो गई? क्या इस बड़ी राशि की सुचना इनकम टैक्स विभाग को दी गई थी? नियम कहता है कि किसी भी कर्मचारी को 2 लाख रुपये से ऊपर के भुगतान या संपत्ति खरीदी पर सरकार से अनुमति लेनी होती है और बचत का पूरा ब्यौरा देना पड़ता है। पर पांडेय जी ने इस नियम को भी किनारे रख दिया।

नियम-कायदों की अनदेखी का सिलसिला केवल यही तक सिमित नहीं है। पांडेय के पिता मध्य प्रदेश के रीवा में वन विभाग में तृतीय श्रेणी के कर्मचारी थे। वे बकायदा पेंशनर हैं। सरकारी नियम के मुताबिक, जो माता-पिता खुद सरकारी पेंशन ले रहे हों, वे बेटे पर आश्रित नहीं हो सकते। इसके बावजूद उनके नाम पर मुंबई के नामी ब्रीच कैंडी अस्पताल का बिल लगाकर 42 लाख का बिल पास कराने की फाइल चल पड़ी।

इस फर्जीवाड़े की शिकायत अंबिकापुर के पत्रकार ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में की थी। 25 अगस्त को हेल्पलाइन से शिकायतकर्ता के पास फोन बजता है। उधर से पूछा जाता है कि शिकायत की जांच अधीक्षण अभियंता (सिंचाई विभाग) को सौंप दी गई है, क्या आप संतुष्ट हैं? मतलब जिसके खिलाफ 42 लाख के बिल निकालने की शिकायत है, सरकार ने उसी अफसर के हाथ में जांच की फाइल पकड़ा दी है। खुद की चोरी की जांच खुद ही करो और अपने आप को बाइज्जत बरी कर लो। सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति का इससे नायाब नमूना शायद ही कहीं मिले।

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सात महीने से यह शिकायत दफ्तरों में धूल खा रही है। बीते मार्च में ईओडब्ल्यू (EOW) की टीम ने कार्यालय में छापा मारा था और तमाम दस्तावेज भी जब्त किए थे। पर बीच में कुछ ऐसी तगड़ी सेटिंग जमी कि फाइल ही कहीं गुम हो गई। अफसर की पहुंच इतनी ऊपर तक है कि सत्ता कोई भी हो, इनका रसूख कभी कम नहीं होता। पिछली सरकार में मंत्रियों की सिफारिशें दरकिनार कर दी गई थीं, लेकिन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की लिखी चिट्ठी पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इन्हें 10 साल के अनुभव का हवाला देकर गरियाबंद में मनचाही पोस्टिंग दे दी थी।

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सिस्टम से खेलने का उनका यह कोई पहला मामला नहीं है। टी.डी.पी. संभाग में तैनाती के दौरान भी बिना किसी तकनीकी या वित्तीय स्वीकृति के 28 पीस वर्क में 67 करोड़ रुपये का भुगतान करा दिया गया था। वित्त विभाग से ऐसी सांठगांठ रही कि करोड़ों रुपये आसानी से पार हो गए। इसके अलावा जगदलपुर की बोधघाट कॉलोनी में बिना सरकारी अनुमति के 12 कमरों का आलीशान 'शीश महल' जैसा सरकारी आवास भी तान दिया गया है।

हालत यह है कि शिकायतें दर्ज होती हैं, छापों की कागजी खानापूर्ति होती है, पर अफसर बेखौफ होकर अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं और फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक बस घूम रही हैं।

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