सरकारी साइकिल मिली, लेकिन निकली खराब! पेंड्रा में छात्राओं को बांटी गईं टूटी-फूटी साइकिलें, गुणवत्ता पर उठे सवाल

सरकारी साइकिल मिली, लेकिन निकली खराब! पेंड्रा में छात्राओं को बांटी गईं टूटी-फूटी साइकिलें, गुणवत्ता पर उठे सवाल

पेंड्रा। छात्राओं को स्कूल तक सुरक्षित और सुविधाजनक आवागमन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चलाई जा रही सरकारी साइकिल वितरण योजना पर पेंड्रा में सवाल खड़े हो गए हैं। पीएम श्री स्वामी आत्मानंद हिंदी माध्यम कन्या विद्यालय में कक्षा 9वीं की छात्राओं को वितरित की गई साइकिलों में कई तरह की खामियां सामने आई हैं। कहीं साइकिल टूटी मिली तो कहीं उसके पार्ट्स खराब पाए गए। साइकिलों की हालत सामने आने के बाद सरकारी योजना के तहत की जाने वाली गुणवत्ता जांच और सप्लाई व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं।

छात्राओं को मिलीं खराब साइकिलें
विद्यालय में साइकिल वितरण के बाद जब छात्राओं ने इनका इस्तेमाल शुरू किया तो कुछ साइकिलों में खराबी सामने आई। कई साइकिलों की स्थिति ऐसी बताई गई कि उन्हें तत्काल मरम्मत की जरूरत पड़ गई। मामला सामने आने के बाद छात्राओं और स्कूल से जुड़े लोगों ने इसकी जानकारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाई।

मौके पर पहुंचे नगर पालिका अध्यक्ष
जानकारी मिलने के बाद नगर पालिका अध्यक्ष राकेश जालान विद्यालय पहुंचे और छात्राओं को दी गई साइकिलों का मौके पर निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कई साइकिलों में खामियां मिलने पर उन्होंने नाराजगी जताई। उनका कहना था कि छात्राओं को ऐसी साइकिलें नहीं दी जानी चाहिए, जिनका इस्तेमाल करने से उनके सुरक्षित आवागमन पर ही सवाल खड़ा हो जाए।

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'वितरण से पहले क्यों नहीं हुई गुणवत्ता जांच?'
मामले ने सरकारी योजनाओं में गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब साइकिलें छात्राओं को वितरित की गईं, तो उससे पहले उनकी तकनीकी और गुणवत्ता जांच किस स्तर पर की गई? यदि जांच हुई थी तो खराब साइकिलें वितरण सूची तक कैसे पहुंचीं? स्थानीय स्तर पर अब यह मांग उठ रही है कि केवल खराब साइकिलों की मरम्मत कराने के बजाय पूरी सप्लाई और गुणवत्ता जांच प्रक्रिया की समीक्षा की जाए।

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जनप्रतिनिधि ने अपने खर्च पर मरम्मत का दिया आश्वासन
छात्राओं की परेशानी को देखते हुए नगर पालिका अध्यक्ष राकेश जालान ने खराब साइकिलों की मरम्मत अपने निजी खर्च पर कराने का आश्वासन दिया है।उनके इस कदम से छात्राओं को तत्काल राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इससे सरकारी व्यवस्था पर एक और सवाल खड़ा हो गया है कि जिस योजना के तहत छात्राओं को सुविधा उपलब्ध कराई जानी थी, उसकी खराबी दूर करने की जिम्मेदारी आखिर निजी स्तर पर क्यों उठानी पड़ रही है?

योजना का मकसद सुविधा, खराब साइकिलों ने बढ़ाई परेशानी
सरकारी साइकिल वितरण योजना का उद्देश्य छात्राओं को स्कूल आने-जाने में सुविधा देना और दूर-दराज से पढ़ने आने वाली छात्राओं के लिए सुरक्षित परिवहन उपलब्ध कराना है। लेकिन यदि वितरण के बाद साइकिलें ही खराब निकलें तो योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है। खासकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों की छात्राओं के लिए साइकिल केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि स्कूल तक पहुंचने का महत्वपूर्ण साधन होती है।

अब जांच और कार्रवाई पर टिकी नजर
मामला सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासन इस पूरे प्रकरण को किस गंभीरता से लेता है। क्या केवल खराब साइकिलों की मरम्मत कर मामले को खत्म कर दिया जाएगा या फिर यह भी जांच होगी कि साइकिलों की गुणवत्ता जांच में लापरवाही कहां हुई? यदि सरकारी रिकॉर्ड में साइकिलें मानक के अनुरूप पाई गई थीं, तो मौके पर खराब साइकिलें पहुंचने की वजह भी सामने आनी चाहिए। फिलहाल, छात्राओं को बेहतर और सुरक्षित साइकिल उपलब्ध कराने के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करने की मांग जोर पकड़ रही है।

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