ब्रिटिश काल से जुड़ा विवाद, किसान की तीन दशक लंबी लड़ाई पहुंची सुप्रीम कोर्ट

ब्रिटिश काल से जुड़ा विवाद, किसान की तीन दशक लंबी लड़ाई पहुंची सुप्रीम कोर्ट

रायपुर।  द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश शासन ने एक किसान की जमीन का अधिग्रहण कर लिया था l जिसे वापस पाने के लिए किसान 35 साल से सरकारी दफ्तरों और  अदालतों के चक्कर कट रहा हैं lएक साधारण किसान, जिसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी जमीन पर एक विश्वस्तरीय एयरपोर्ट खड़ा हो जाएगा, लेकिन अश्विनी बांधे (53 वर्ष) की जिंदगी अब उसी सपने और हकीकत की जंग बन चुकी है।  उनका दावा है कि स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और सामने का गार्डन ठीक उसी 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन पर बसा है, जो उनके पूर्वजों की थी।

ये कहानी  1942 की हैं , जब पूरी दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध की आग में जल रही थी। ब्रिटिश सरकार ने ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1939’ के तहत देशभर में सैन्य जरूरतों के लिए लाखों एकड़ जमीन अस्थायी तौर पर अधिग्रहित की। रायपुर के माना इलाके में भी एयरफील्ड बनाने के लिए बांधे परिवार की जमीन कब्जे में ले ली गई। दस्तावेजों के मुताबिक, यह अधिग्रहण युद्धकालीन अस्थायी था — युद्ध खत्म होने के छह महीने बाद जमीन वापस करनी थी और सालाना ₹1300 किराया देना था। लेकिन न किराया मिला, न जमीन लौटी।

35 साल की अथक जंग:
1990 के दशक में जब अश्विनी बांधे ने जमीन के रिकॉर्ड तलाशना शुरू किया, तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह उनकी जिंदगी का सबसे लंबा और महंगा सफर बन जाएगा। 10वीं पास इस किसान ने रिकॉर्ड रूम, लाइब्रेरी, पुराने दफ्तरों और कोर्टों में घूम-घूमकर दस्तावेज जुटाए। उनके पास आज ऐसे रिकॉर्ड हैं जो गूगल पर भी नहीं मिलेंगे। उन्होंने देश भर से पुरानी फाइलें खंगालीं।

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पिछले 35 साल में उन्होंने 15-20 करोड़ रुपये खर्च कर दिए — वकीलों की फीस, यात्राएं, कोर्ट के चक्कर और दस्तावेज जुटाने में। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2026 में दोबारा जांच के आदेश दिए, लेकिन किसान का कहना है कि सक्षम अधिकारी पहले ही जांच कर चुके हैं। जून 2026 में वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, जहां बकाया किराया, ब्याज और जमीन के हक को जोड़ते हुए करीब 3500 करोड़ रुपये का मुआवजा मांगा है। मामला अभी विचाराधीन है।

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कानूनी और ऐतिहासिक कनेक्शन:
डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट 20 सितंबर 1946 को समाप्त हो गया। आजादी के बाद कंटीन्यूएंस ऑफ पावर्स एक्ट, 1947 के तहत कुछ व्यवस्थाएं जारी रहीं, लेकिन बांधे परिवार के अनुसार उनकी जमीन स्थायी रूप से सरकार के पास नहीं रही। उन्होंने सेंट्रल प्रोविंसेज एंड बरार क्षेत्र के 15,539 एकड़ जमीन अधिग्रहण के रिकॉर्ड का हवाला दिया, जिसमें माना एयरफील्ड भी शामिल था।

ये कहानी सिर्फ एक किसान बनाम सरकार की नहीं है। ये है ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत, युद्धकालीन कानूनों की जटिलताओं, स्वतंत्र भारत की भूमि नीतियों और एक आम आदमी की अटूट इच्छाशक्ति की मिसाल। अश्विनी बांधे आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं — सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनकी जिंदगी बदल सकता है। क्या अदालत इतिहास के इस अनोखे दावे को मानेगी? या विकास की उड़ान में एक किसान का सपना फिर से दब जाएगा? पूरा देश इस रोमांचक कानूनी सागा को देख रहा है।

 

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