पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा नकदी प्रकरण में दोषी करार: लोकसभा जांच समिति ने सदन में पेश की रिपोर्ट, जवाबों को बताया टालमटोल वाला

पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा नकदी प्रकरण में दोषी करार: लोकसभा जांच समिति ने सदन में पेश की रिपोर्ट, जवाबों को बताया टालमटोल वाला

नई दिल्ली. इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में बेहिसाब नकदी मिलने के मामले में दोषी ठहराया गया है। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सदन में प्रस्तुत कर दी है। समिति ने पूर्व न्यायाधीश द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को असंतोषजनक और भ्रामक माना है।

समिति ने तीनों आरोपों को सही माना

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से बनाई गई जांच समिति ने जस्टिस वर्मा पर लगे तीनों आरोपों को प्रमाणित माना है। इनमें सरकारी बंगले से बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी का मिलना, महत्वपूर्ण सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना और जांच प्रक्रिया के दौरान भ्रामक जानकारी देना शामिल है।

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आग लगने के बाद सामने आया था मामला

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यह घटनाक्रम 14-15 मार्च 2025 की रात का है। उस वक्त जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में पदस्थ थे। नई दिल्ली में स्थित उनके सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझने के बाद स्टोर रूम से 500 रुपये के जले और अधजले नोटों के ढेर बरामद हुए थे। इस घटना का एक वीडियो भी सामने आया था। उस समय जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से इनकार करते हुए इसे उन्हें फंसाने की साजिश करार दिया था।

जांच का गठन और कानूनी स्थिति

तत्कालीन चीफ जस्टिस के निर्देश पर एक आंतरिक जांच की गई थी। उस जांच में प्रतिकूल तथ्य सामने आने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई। इस समिति के गठन को विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों का समर्थन प्राप्त था।

हालांकि, जांच पूरी होने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अब इस रिपोर्ट पर संसद आगे क्या कदम उठाएगी, यह स्थिति स्पष्ट नहीं है। कुछ कानूनी जानकारों का तर्क है कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम का प्रयोग केवल वर्तमान में पद पर कार्यरत न्यायाधीश के खिलाफ ही किया जा सकता है।

सबूतों के संरक्षण में कमी

जांच के दौरान समिति ने यह दर्ज किया है कि मौके से मिली नकदी को विधिवत जब्त नहीं किया गया और न ही उसकी गिनती हुई। घटना स्थल पर कोई पंचनामा या इन्वेंट्री नहीं बनाई गई और नोटों के नमूने भी सुरक्षित नहीं रखे गए। इसके बावजूद, समिति का मानना है कि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करने के लिए काफी हैं कि बरामद नकदी की मात्रा बहुत बड़ी थी।

बयान बदलते रहे, कार्यवाही से बनाई दूरी

समिति की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा के जवाब समय-समय पर बदलते रहे। शुरुआती जवाब में उन्होंने नकदी के बारे में कोई जानकारी होने से इनकार किया और कहा कि उनके परिवार या कर्मचारियों ने ऐसी कोई नकदी नहीं देखी।

बाद में बचाव में नकदी की जब्ती न होने, नोटों के नकली होने की आशंका, साजिश, नकदी प्लांट किए जाने और पहले पहुंचने वाले लोगों द्वारा नकदी हटाए जाने जैसी दलीलें दी गईं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि साजिश या नकदी प्लांट किए जाने की बातों को लेकर कोई शिकायत या एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई।

अभियोजन पक्ष के साक्ष्य पूरे होने के बाद, जब बचाव पक्ष की गवाही का समय आया, तो जस्टिस वर्मा जांच कार्यवाही से अलग हो गए। उन्होंने न तो स्वयं गवाही दी और न ही अपने परिवार, निजी कार्यालय, घरेलू कर्मचारियों या सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति को गवाह के तौर पर पेश किया। इन्ही परिस्थितियों के आधार पर समिति ने उनके बयानों को अधूरा और भ्रामक मानते हुए उन्हें दोषी करार दिया है।

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