बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला : 0.3% की कमी के कारण नाबालिग को शिक्षा से वंचित करना उचित नहीं, 10 दिन में दाखिले के निर्देश

बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला : 0.3% की कमी के कारण नाबालिग को शिक्षा से वंचित करना उचित नहीं, 10 दिन में दाखिले के निर्देश

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने प्रयास आवासीय विद्यालय, अंबिकापुर में कक्षा 9वीं में प्रवेश से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है । जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने कक्षा 8वीं में 59.7 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले 14 वर्षीय छात्र को राहत देते हुए उसके अंकों को राउंडिंग ऑफ के आधार पर 60 प्रतिशत मानने का निर्देश दिया है । कोर्ट ने संबंधित छात्र को 10 दिनों के भीतर विद्यालय में प्रवेश देने के आदेश जारी किए हैं । हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि यह राहत इस विशेष मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दी गई है । इसे जेईई, नीट, क्लैट अथवा अन्य उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में पात्रता के लिए राउंडिंग ऑफ की सामान्य नजीर नहीं माना जाएगा ।

59.7 प्रतिशत अंक बने प्रवेश में बाधा

उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के बतौली निवासी 14 वर्षीय छात्र विधाता गुप्ता ने प्रयास आवासीय विद्यालय, अंबिकापुर में सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 9वीं में प्रवेश हेतु आवेदन किया था । प्रवेश नियमों के अनुसार कक्षा 8वीं में न्यूनतम 60 प्रतिशत अंक अथवा उसके समकक्ष ग्रेड में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था । विधाता ने सीबीएसई से कक्षा 8वीं की परीक्षा पास की थी । उसे सी1 ग्रेड के साथ कुल 59.7 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे । इसके बाद उसने प्रयास आवासीय विद्यालय की राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षा में हिस्सा लिया और 100 में से 82 अंक हासिल कर मेरिट सूची में स्थान बनाया । 23 जुलाई 2026 को पहली काउंसलिंग में पहुंचने पर स्कूल प्रबंधन ने उसे केवल इसलिए प्रवेश के लिए अपात्र बता दिया, क्योंकि उसके कक्षा 8वीं के अंक निर्धारित 60 प्रतिशत से 0.3 प्रतिशत कम थे ।

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मेरिट में आने के बाद रोका गया प्रवेश

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छात्र की ओर से हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि विभाग ने उसका आवेदन स्वीकार किया, उसे प्रवेश परीक्षा में शामिल होने का अवसर दिया और उसने परीक्षा में 82 प्रतिशत अंक हासिल कर अपनी योग्यता भी साबित की । इसके बावजूद मेरिट में आने के बाद महज 0.3 प्रतिशत की कमी के आधार पर उसे प्रवेश से वंचित किया गया । याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त अधिकारों के विपरीत बताया । उसके अधिवक्ता ने दलील दी कि 59.7 प्रतिशत अंक को सामान्य राउंडिंग ऑफ के सिद्धांत के तहत 60 प्रतिशत माना जा सकता है । चूंकि दशमलव के बाद का अंक 0.7 है, इसलिए इसे अगले पूर्ण अंक तक बढ़ाया जाना न्यायसंगत होगा ।

सरकार ने नियमों का दिया हवाला

राज्य शासन की ओर से कोर्ट में इसका विरोध किया गया । शासन ने कहा कि प्रवेश नियमावली में न्यूनतम 60 प्रतिशत अंक की स्पष्ट शर्त रखी गई है । निर्धारित पात्रता से कम अंक होने पर छात्र स्वतः अपात्र हो जाता है । शासन ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निर्धारित पात्रता शर्तों में अदालत द्वारा छूट या राउंडिंग ऑफ की अनुमति नहीं दी जा सकती ।

बच्चे के हित में कोर्ट ने अपनाया व्यावहारिक रुख

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने माना कि बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं और तकनीकी चयन प्रक्रियाओं में पात्रता मानकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राउंडिंग ऑफ को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन वर्तमान मामला एक नाबालिग बच्चे के विद्यालय प्रवेश से जुड़ा है । कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि छात्र ने राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षा में 100 में से 82 अंक हासिल कर अपनी योग्यता साबित की है । ऐसे में केवल 0.3 प्रतिशत अंकों की कमी के कारण उसे विद्यालय में प्रवेश से वंचित करना उचित नहीं होगा । हाई कोर्ट ने राउंडिंग ऑफ के सिद्धांत को लागू करते हुए 59.7 प्रतिशत को 60 प्रतिशत मानने का आदेश दिया और संबंधित छात्र को 10 दिनों के भीतर प्रयास आवासीय विद्यालय, अंबिकापुर में कक्षा 9वीं में प्रवेश देने के निर्देश दिए ।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए नहीं होगी नजीर

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विशेष रूप से यह स्पष्ट किया कि आदेश का लाभ केवल इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में दिया गया है । इसे जेईई, नीट, क्लैट या अन्य उच्च प्रतियोगी परीक्षाओं में निर्धारित पात्रता अंकों को राउंडिंग ऑफ कर पूरा करने के लिए सामान्य उदाहरण या नजीर के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा ।

इस फैसले से एक ओर जहां छात्र को शिक्षा जारी रखने का अवसर मिला है, वहीं दूसरी ओर कोर्ट ने पात्रता नियमों और उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के मानकों की गंभीरता को भी स्पष्ट बनाए रखा है ।

 

 

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