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क्या शराबबंदी पर बीजेपी की चालें नीतीश कुमार के लिए चुनौती बन सकती हैं
राष्ट्रीय जगत विजन। बिहार में शराबबंदी लागू हुए एक दशक से ज्यादा हो चुका है, और इस कानून को लेकर राजनीतिक खेमे में फिर से सवाल उठने लगे हैं। बिहार विधानमंडल के बजट सत्र के दौरान शराबबंदी पर जमकर बहस हो रही है, और अब ये मुद्दा केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सत्ता पक्ष के भी कई विधायक और मंत्री इसे लेकर चिंतित हैं।
राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर इस समय राजनीतिक दबाव महसूस हो रहा है। शराबबंदी को लेकर उनकी 'ज़िद' पर सवाल उठाए जा रहे हैं, और इसे समीक्षा की मांग के रूप में उभारा जा रहा है। इस स्थिति में राज्य की राजनीति का रुख बदला हुआ दिखता है। विशेष रूप से विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने सीधे तौर पर बीजेपी पर आरोप लगाया है कि पार्टी जानबूझकर शराबबंदी के खिलाफ माहौल बना रही है, ताकि इसे खत्म कराया जा सके।हालांकि, यह दिलचस्प है कि नीतीश कुमार ही वे नेता थे जिन्होंने 2005 में सत्ता संभालने के बाद शराब नीति को उदार किया था, जिसके बाद राज्य में शराब के कारोबार में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। लेकिन 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी ने राज्य के राजस्व में एक बड़ा बदलाव लाया, और शराब से मिलने वाला एक्साइज ड्यूटी भी शून्य हो गया। इस बीच, बिहार के विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने भी इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया है, और उनका कहना है कि शराबबंदी के नाम पर राज्य में 40,000 करोड़ रुपये की अवैध अर्थव्यवस्था चल रही है, जिससे राज्य सरकार की नाकामी को उजागर किया जा रहा है।
अब सवाल ये है कि क्या शराबबंदी का यह कानून जो नीतीश कुमार की 'प्रण' के रूप में सामने आया था, वह भविष्य में राजनीतिक दबाव के चलते वापस हो सकता है? या फिर बिहार की जनता इस कानून को लेकर कुछ और सोच रखती है? फिलहाल, यह स्थिति बिहार की राजनीति को और भी दिलचस्प बना रही है, क्योंकि शराबबंदी के मुद्दे पर बीजेपी और अन्य राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष साफ देखा जा रहा है।
लेखक के विषय में
मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।
