अजीत जोगी की राह चले भूपेश…और हो गये सत्ता से बाहर

अजीत जोगी की राह चले भूपेश…और हो गये सत्ता से बाहर

अजीत जोगी की राह चले भूपेश…और हो गये सत्ता से बाहर रायपुर : कांग्रेस का दर्द यही है कि उसका कोई छत्रप सत्ता में बैठता है तो कांग्रेस संगठन को अपने यहां गिरवी रखे जैसा व्यवहार करने लगता है। अपने हिस्से की रायल्टी देने के बाद वह सत्ता व संगठन पर कुछ इस तरह काबिज […]

अजीत जोगी की राह चले भूपेश…और हो गये सत्ता से बाह


रायपुर : कांग्रेस का दर्द यही है कि उसका कोई छत्रप सत्ता में बैठता है तो कांग्रेस संगठन को अपने यहां गिरवी रखे जैसा व्यवहार करने लगता है। अपने हिस्से की रायल्टी देने के बाद वह सत्ता व संगठन पर कुछ इस तरह काबिज होता है कि इससे जुड़ी कायनात उससे खौफ खाती है यहां तक की जनता भी। वोंटिग के दिन डर के मारे घर से बाहर निकलकर लंबी लाइनों में लगकर वोट देते हैं कि कही फि र वापस न आ जाए।

वर्ष 2000 में बिना किसी चुनाव के मुख्यमंत्री मनोनीत हुए अजीत जोगी का तीन साल का कार्यकाल कुछ ऐसा ही रहा कि फिर उन्होंने पूरे 15 साल कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखा। यानि अजीत जोगी कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के दूसरे दावेदारों को दूर रखने के लिए जो धतकरम यानि टिकिट देकर चुनाव हरवाने का काम करते थे। उसी में कांग्रेस 36 और 37 सीट पर रूक जाती थी वैसे तो अपने तीन साल के कार्यकाल में जोगी ने अमीर धरती के गरीब लोग का फ र्जी नारा तैयार कर रखा था और इस नारे की आड़ में वो सारे धतकरम हो रहे थे जिसके चलते एक बड़ा गिरोह तैयार हुआ और अराजकता पैदा हुई, जिसे आम छत्तीसगढ़ का जनमानस बर्दाश्त नहीं कर पाया।

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कमोबेश इसी तरह का काम पांच साल में भूपेश बघेल ने किया। उनके इस पांच साल के कार्यकाल के बाद कांग्रेस अब कितने साल सत्ता से बाहर रहती है यह तो समय के गर्भ में है लेकिन जिस उम्मीद से जनता ने कांग्रेस को बम्पर जनादेश दिया। जनता की उम्मीद पर खरा नहीं उतरे। नतीजतन सत्ता से बाहर कर दिया। जोगी की तरह ही भूपेश ने पिछड़ा वर्ग को सामाजिक न्याय का लालीपाप तो दिखाया लेकिन 8 ब्राम्हण समेत 15 ऐसे सवर्ण उम्मीदवार उतारने के लिए संगठन पर दबाव डाला।

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ये सभी लोग किसी भी सर्वे में अपने क्षेत्र में चुनाव जीत ही नहीं रहे थे। इसमें से 8 ब्राम्हण और पांच अन्य सवर्ण उम्मीदवार भाजपा के पिछड़ा वर्ग के सामान्य पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों से चुनाव हार गए। यानि भाजपा ने बिना ढिंढोरा पीटे अपने पिछड़ा वर्ग और छत्तीसगढिय़ावाद के मिशन को पूरा कर दिया। 2018 के मंत्रिमंडल के 9 भारी भरकम नेता चुनाव हार गए। 2018 के चुनाव में भाजपा को मांत्र 33 फ़ीसदी सदी और कांग्रेस को 44 फ़ीसदी सदी वोट मिले थे। सीटें भाजपा को 15 कांग्रेस 68 मिली थी।

इस बार कांग्रेस को वोट मात्र 0.86 फीसदी कम हुआ लेकिन भाजपा का 33 से बढ़कर 46 फीसदी हो गया। 13 फीसदी के अन्तर में कांग्रेस 35 पर आकर रूक गई और भाजपा को 54 सीट मिल गई। सीट और वोट के मामले में कांग्रेस में दुर्गति 23 साल में पहली बार ऐसी हुई है। पिछले छह महीने से दैनिक नवप्रदेश लिखता चला आ रहा है कि इस बार एक-एक सीट और एक-एक वोट के लिए घना संघर्ष है, लेकिन सत्ता के मद में चूर कांग्रेस के सत्ता और संगठन को समझ में ही नहीं आ रहा था कि 71 सीटों वाली कांग्रेस सत्ता से बाहर हो सकती है।

हालांकि भाजपा का थिंकटैंक इस बात को लेकर आश्वस्त था कि हम 50 से अगर 15 पर आ सकते है तो कांग्रेस को 71 से 41 पर लाना कोई बड़ी बात नहीं। बस ढिंढौरा नहीं पीटना है, काम करना है। भाजपा ने काम किया और कांग्रेस ने ढिंढौरा पीटा, नतीजा सबके सामने है। 2003 में तीन साल सत्ता में रहते कांग्रेस को 90 में 36 सीट मिली और सत्ता से बाहर हो गई। 2008 में विपक्ष में रहते 37 सीट, और 2013 में 38 सीट मिली। यानि विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस 38 सीटों से कम नहीं जीती, लेकिन 2018 से 23 तक बम्पर जनादेश की सरकार चलाने वाले कांग्रेस 2023 में 35 सीटों पर आकर रूक गई। इसकी एक वजह यह भी रही और भ्रष्टाचार,वन मेन आरमी सिर्फ मै और कोई नहीं किसी की न सुनना महादेव सट्टा एप मुख्य वजह रही।

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