महाराष्ट्र में 5% मुस्लिम आरक्षण रद्द

देवेंद्र फडणवीस सरकार का बड़ा फैसला, सियासत तेज

download मुंबई। महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने बड़ा और विवादित फैसला लेते हुए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिम वर्ग (SBC-A) को दिया गया 5 फीसदी आरक्षण पूरी तरह रद्द कर दिया है। सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि इस श्रेणी के तहत अब न तो जाति प्रमाणपत्र जारी होंगे और न ही शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश मिलेगा।

सरकार ने अपने निर्णय के पीछे कानूनी स्थिति का हवाला दिया है, जबकि विपक्ष ने इसे अल्पसंख्यक समुदाय के साथ अन्याय बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

2014 में हुआ था आरक्षण का ऐलान

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यह आरक्षण व्यवस्था वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लागू की गई थी। उस समय राज्य में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे पृथ्वीराज चव्हाण। लोकसभा चुनाव 2014 में करारी हार के बाद तत्कालीन सरकार ने मुसलमानों को 5% और मराठा समुदाय को 16% आरक्षण देने का फैसला 25 जून 2014 को मंजूर किया था। मुस्लिम आरक्षण का आधार महमूद उर-रहमान समिति की सिफारिशें थीं, जिसने 8% कोटा देने की अनुशंसा की थी। हालांकि कैबिनेट ने 5% पर मुहर लगाई।

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हाई कोर्ट की रोक और अध्यादेश खत्म

आरक्षण लागू होते ही इसे अदालत में चुनौती दी गई।14 नवंबर 2014 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। 23 दिसंबर 2014 तक यह अध्यादेश कानून का रूप नहीं ले सका और स्वतः समाप्त हो गया। हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सीमित राहत मिलने की बात कही गई थी, लेकिन पूर्ण रूप से व्यवस्था लागू नहीं रह सकी।

अब सरकार का नया कदम

ताजा आदेश में सरकार ने साफ कर दिया है कि SBC-A श्रेणी के तहत जारी सभी पुराने सरकारी प्रस्ताव और सर्कुलर रद्द माने जाएंगे

नई जाति या जाति वैधता प्रमाणपत्र जारी नहीं होंगे कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में इस कोटे के तहत कोई प्रवेश नहीं मिलेगासरकार का कहना है कि चूंकि अध्यादेश कानून नहीं बन पाया था और हाई कोर्ट का अंतरिम स्थगन प्रभावी था, इसलिए यह फैसला आवश्यक था।

मुस्लिम समुदाय की स्थिति

महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय की आबादी करीब 11.5% है।सच्चर समिति (2006) और रंगनाथ मिश्रा आयोग (2004) की रिपोर्टों में मुस्लिम समुदाय के आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को उजागर किया गया था। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर 2008 में राज्य सरकार ने महमूद उर-रहमान समिति गठित की थी।

सियासी असर

इस फैसले ने एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति को गरमा दिया है। विपक्ष इसे “सामाजिक न्याय पर प्रहार” बता रहा है, जबकि सरकार इसे “कानूनी मजबूरी” का परिणाम बता रही है। अब देखना होगा कि यह मुद्दा आने वाले समय में अदालत और सियासत—दोनों में किस दिशा में जाता है।

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