बिहार टेंडर घोटाला: सत्ता और सिस्टम पर सवालों की आंधी, IAS अफसरों के घरों तक पहुंची विजिलेंस, बड़े नेटवर्क के खुलासे के संकेत
पटना: बिहार में सामने आए कथित टेंडर घोटाले ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) की ताबड़तोड़ छापेमारी ने यह संकेत दिया है कि मामला केवल कुछ फाइलों की गड़बड़ी तक सीमित नहीं, बल्कि एक बड़े नेटवर्क और कथित मिलीभगत की परतों से जुड़ा हो सकता है।
पटना के वीआईपी इलाकों में एक साथ हुई कार्रवाई ने पूरे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। दो वरिष्ठ IAS अधिकारियों के आवासों पर हुई तलाशी और एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी के डायरेक्टर के घर तक जांच पहुंचने से यह मामला और भी गंभीर होता दिख रहा है।
सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियां टेंडर आवंटन प्रक्रिया, फाइल मूवमेंट और कथित वित्तीय लेन-देन की बारीकी से जांच कर रही हैं। दस्तावेजों, बैंक रिकॉर्ड और प्रॉपर्टी डील्स से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं, जिससे यह समझने की कोशिश की जा रही है कि कहीं सरकारी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए तो नहीं किया गया।
घोटाले की जांच में यह भी सामने आ रहा है कि कुछ कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर की पात्रता शर्तों में हेरफेर किए जाने के आरोप हैं। इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने और चुनिंदा फर्मों के पक्ष में सिस्टम झुकाने की आशंका जताई जा रही है। आरोप यह भी हैं कि टेंडर प्रक्रिया में भले ही नाम किसी एक कंपनी का रहा हो, लेकिन वास्तविक काम और वित्तीय लाभ कथित तौर पर अन्य जुड़े हुए नेटवर्क तक पहुंचाया गया है।
जांच एजेंसियों की नजर उन सभी कड़ियों पर है, जो इस पूरे मामले को जोड़ती हैं। कथित मास्टरमाइंड के रूप में सामने आए नाम और उससे जुड़े लोगों की भूमिका को लेकर गहन पूछताछ और दस्तावेजी सत्यापन जारी है। हालांकि अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है, लेकिन शुरुआती जांच से यह संकेत जरूर मिलते हैं कि मामला व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर एक संगठित तंत्र की ओर इशारा कर सकता है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या सरकारी टेंडर प्रक्रियाएं पारदर्शिता की बजाय प्रभाव और नेटवर्किंग पर निर्भर होती जा रही हैं। जांच पूरी होने के बाद ही तस्वीर साफ होगी, लेकिन विजिलेंस की कार्रवाई ने पूरे प्रशासनिक ढांचे को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
