सत्ता की मलाई का संग्राम, प्रभारी मंत्री के खिलाफ अपनों ने ही खोला मोर्चा!
सियासत की बिसात पर जब 'मलाई' काटने की होड़ मचती है, तो सबसे पहले संगठन का ही रायता फैलता है। इन दिनों सत्तासीन दल के भीतर एक जिले में जो सिर फुटौव्वल चल रही है, उसकी पटकथा किसी विपक्षी ने नहीं, बल्कि खुद तीन-तीन जिलों का भार ढो रहे एक वजनी प्रभारी मंत्री ने लिखी है। सियासी गलियों में आजकल इस जिले का यह बगावती एपिसोड चटखारे लेकर सुना - सुनाया जा रहा है।
दरअसल, किस्सा कुछ यूं है कि प्रभारी मंत्री जी के पास कहने को तो तीन जिलों का प्रभार है, लेकिन रसूख के नाम पर उनके हाथ बंधे हुए हैं। पहले जिले में एक दूसरे दिग्गज मंत्री का सिक्का चलता है, इसलिए वहां इनकी दाल नहीं गलती। दूसरे जिले में एक कद्दावर विधायक ने ऐसा खूंटा गाड़ रखा है कि वहां भी मंत्री जी को हमेशा 'डाउन' ही रहना पड़ता है। दो जगहों से खाली हाथ रहने के बाद मंत्री जी ने सोचा कि चलो, तीसरे जिले को ही अपनी जागीर बना लिया जाए। मंसूबा यह था कि इस जिले को पूरी तरह से अपने इशारों पर नचाकर सत्ता का असली सुख भोगा जाए।
लेकिन, यहां एक बड़ा पेंच फंस गया। मंत्री जी की 'जेब भरने' की इस हसरत के आड़े आ गए खुद जिले के जिलाध्यक्ष। सियासत के जानकारों का कहना है कि जब दो नेता एक ही 'लक्ष्य' पर काम कर रहे हों, तो टकराव लाजिमी है। इसी वर्चस्व और हिस्सेदारी की जंग में गाज गिरी एक बेचारे मंडल अध्यक्ष पर, जिसे बलि का बकरा बना दिया गया। मंडल अध्यक्ष को कुर्सी से क्या हटाया गया, पार्टी के भीतर मानो बगावत का ज्वालामुखी ही फूट गया।
बीते दिनों हुई जिला स्तरीय सांगठनिक बैठक में यह चिंगारी दावानल बन गई। बंद कमरे में हुई बैठक में कार्यकर्ताओं का गुबार ऐसा फूटा कि संगठन के अनुशासन की चादर तार-तार हो गई। मंडल अध्यक्ष की छुट्टी किए जाने पर कार्यकर्ताओं ने सीधा मोर्चा खोलते हुए कहा कि एसी कमरों में बैठकर फरमान जारी करने से पहले जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं की राय तो जान ली होती! इस दौरान जिला प्रभारी और जिलाध्यक्ष की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसा असंतोष दिखा कि बैठक का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
आग में घी डालने का काम किया एक वरिष्ठ पार्षद से जुड़े विवाद ने। इस मुद्दे पर ऐसा बवाल मचा कि बैठक का माहौल भारी तनावपूर्ण हो गया। बात यहीं तक नहीं रुकी, बल्कि मंडल स्तर की अन्य नियुक्तियों में खुलेआम 'लेन-देन' औरसूटकेस पॉलिटिक्स के गंभीर आरोप भी उछलने लगे।
नतीजा यह हुआ कि संगठनात्मक बैठक खत्म होते ही कार्यकर्ताओं के सब्र का बांध टूट गया। प्रभारी को हटाओ के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। कार्यकर्ताओं ने प्रभारी मंत्री और जिला संगठन प्रभारी को फौरन चलता करने की मांग को लेकर जमकर नारेबाजी की। यह पहली बार है जब बंद कमरों की नाराजगी सड़क पर नारों के रूप में तब्दील हो गई है।
