हिमाचल प्रदेश में है दो भागों में बटा शिवलिंग, इस विशेष अवसर पर हो जाता है एक, बेहद रोचक है इतिहास

हिमाचल प्रदेश में है दो भागों में बटा शिवलिंग, इस विशेष अवसर पर हो जाता है एक, बेहद रोचक है इतिहास सावन माह में भोले के द्वार जय जय कार होती है ,और सावन माह में सभी सोमवार को शिव मंदिरों में भक्तों का सैलाब होता है। इंदौरा स्थित प्राचीन शिव मंदिर काठगढ़ न केवल […]

हिमाचल प्रदेश में है दो भागों में बटा शिवलिंग, इस विशेष अवसर पर हो जाता है एक, बेहद रोचक है इतिहास

सावन माह में भोले के द्वार जय जय कार होती है ,और सावन माह में सभी सोमवार को शिव मंदिरों में भक्तों का सैलाब होता है। इंदौरा स्थित प्राचीन शिव मंदिर काठगढ़ न केवल प्रदेश बल्कि देशभर में या प्रसिद्ध है

हिमाचल : Kathgarh Shiva Temple, सावन माह में भोले के द्वार जय जयकार होती है और सावन माह के सभी सोमवार को शिव मंदिरों भक्तों का सैलाब होता है। जिला कांगड़ा के उपमंडल इंदौरा के तहत डमटाल क्षेत्र से 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर काठगढ़ न केवल प्रदेश बल्कि देश भर में यह प्रसिद्ध है। यहां हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, पंजाब राज्यों के शिव भक्त आते हैं। हिमाचल व पंजाब के सीमावर्ती एरिया में होने के कारण यहां कई राज्यों के शिव भक्त आते हैं।

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उससे भी बड़ी बात तो यह है कि यह मंदिर दुनिया में एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है, जहां शिवलिंग दो भागों में बटे हुए हैं। दो भागों में बटे हुए शिवलिंग स्थायी नहीं है, इन शिवलिंग का मिलन भी होता है। दो भागों में बटा हुआ शिवलिंग महाशिवरात्री पर्व के दौरान जुड़ जाता है। आठ फीट ऊंचे इस शिवलिंग के दर्शन करने दूर दूर से लोग आते हैं।

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सावन माह में खास होता है काठगढ़ शिव मंदिर
सावन माह में दौरान इस मंदिर में पैर धरने को जगह नहीं होती है। पूरा एक माह मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। सावन माह के हर सोमवार को कम से कम 20 से 25 हजार शिव भक्त मंदिर में आते हैं और भोलेनाथ का आशीर्वाद लेते हैं। वहीं सामान्य दिनों में रोजाना हजारों की संख्‍या में श्रद्धालु भोलेनाथ के दर शीश नवाते हैं।

सिकंदर ने जमीन समतल कर बनवाई चारदीवारी

प्राचीन शिवमंदिर काठगढ़ विश्व विजेता सिकंदर के समय 326 ईसा पूर्व बनाया गया था। सिकंदर जब पंजाब पहुंचा और पंजाब में प्रवेश करने से पूर्व वह मीरथल नामक गांव में अपने पांच हजार सैनिक को लेकर खुले मैदान में विश्राम करने लगा। यहां उसने देखा कि एक फकीर शिवंलिग की पूजा में व्यस्त था। सिकंदर ने फकीर से कहा कि वह उनके साथ यूनान चलें वह उन्हें दुनिया का हर एशवर्य देंगे। फकीर ने सिकंदर की बात को अन्नसुना करते हुए कहा आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मेरे तक आने दें। फकीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने टिल्ले पर काठगढ़ महादेव का मंदिर बनाने के लिए भूमि को समतल करवाया और चारदीवारी बनवाई। यहां ब्यास नदी की और अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए जो आज भी यहां है।

राजा रणजीत सिंह ने शिवलिंग पर मंदिर बनवाया

राजा रणजीत सिंह ने जब गद्दी संभाली तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। वह जब काठगढ़ पहुंचे, तो इतना आनंदित हुए कि उन्होंने शिवलिंग पर तुरंत सुंदर मंदिर बनवाया, यहां पूजा करके आगे निकले। मंदिर के पास ही बने कुएं का जल उन्हें इतना पंसद था कि वह हर शुभकार्य के लिए यहीं से जल मंगवाते थे। अर्धनारीश्वर का रूप दो भागों मे विभाजित शिवलिंग का अंतर ग्रहो एवं नक्षत्रों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है। शिवरात्रि‍ पर दोनों का मिलन हो जाता है।

शिवरात्रि पर लगता है तीन दिवसीय मेला

काठगढ़ मंदिर न्यास की ओर से शिवरात्रि के त्यौहार पर प्रत्येक वर्ष तीन दिवसीय मेला लगाया जाता है। मंदिर में मेले के दौरान और सावन माह के सोमवार के दिन पूरा मंदिर श्रद्धालुओं से भरा रहता है। यहां केवल प्रदेश से ही श्रद्धालु नहीं आते, बल्कि भगवान शिव की उपासक पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। शिव और शकित के अर्धनारीश्वर स्वरूप श्री संगम के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दुखों का अंत हो जाता है।

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