सरकारी वकीलों की भारी-भरकम फौज के बावजूद सरकार को लगा एक लाख का जुर्माना, हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग की मनमानी पर लगाई कड़ी फटकार
बिलासपुर । राज्य में सरकारी मुकदमों की पैरवी के लिए वकीलों की एक बड़ी और भारी-भरकम टीम होने के बावजूद, अदालतों में सरकार को कई बार करारी शिकस्त का सामना करना पड़ता है। ताजा मामला बिलासपुर हाईकोर्ट का है, जहां विभागीय अधिकारियों की मनमानी और सरकारी वकीलों की कमजोर पैरवी के चलते सरकार को एक लाख रुपये के जुर्माने की तगड़ी चपत लगी है। यह जुर्माना ठेकेदार को सरकारी खजाने से चुकाया जाएगा। न्यायपालिका द्वारा राज्य सरकार पर इस तरह का आर्थिक दंड लगाना कोई सामान्य बात नहीं है। यह पूरा विवाद बिलासपुर संभाग के जल संसाधन विभाग (Water Resources Department) से जुड़ा हुआ है
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के मुताबिक, जल संसाधन विभाग के ठेकेदार VLCC कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। दो अलग-अलग मौकों पर उसने सबसे कम बोली (Lowest Bid) लगाई थी। कायदे से टेंडर उसे ही मिलना चाहिए था। दिलचस्प बात यह है कि विभागीय अधिकारियों ने ठेकेदार पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की थी, लेकिन इसके बावजूद मूल्यांकन समिति (Evaluation Committee) ने बिना कोई उचित कारण बताए, लगातार दो बार ठेकेदार का टेंडर निरस्त कर दिया। अधिकारियों के इस रवैये से परेशान होकर ठेकेदार ने हाईकोर्ट की शरण ली।
कोर्ट में सरकारी वकील नहीं पेश कर पाए कोई ठोस डेटा
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच (DB) में हुई। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि ठेकेदार की दर 18% अधिक थी, इसलिए 'जनहित' को ध्यान में रखते हुए टेंडर को निरस्त किया गया।
लेकिन, जब डिवीजन बेंच ने इस दावे को साबित करने के लिए ठोस और तुलनात्मक डेटा (Comparative Data) की मांग की, तो सरकारी वकीलों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। कोर्ट में यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ पेश नहीं किया जा सका कि 18% की दर वास्तव में ज्यादा थी। सरकार की ओर से मजबूत पैरवी न होने के कारण केस पूरी तरह से कमजोर पड़ गया।
असीमित नहीं हैं सरकार के अधिकार: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग की इस कार्यप्रणाली को पूरी तरह से भेदभावपूर्ण और मनमाना माना। डिवीजन बेंच ने अपने तल्ख फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि, "इसमें कोई शक नहीं कि सरकार के पास किसी भी टेंडर को निरस्त करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार 'असीमित' (Unlimited) नहीं है। इसका इस्तेमाल अपनी मर्जी से मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।"
ठेकेदार को हुई परेशानी, खजाने को हुआ नुकसान
कोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए नोट किया कि विभाग की इस अनुचित और मनमानी प्रक्रिया के कारण याचिकाकर्ता (ठेकेदार) को भारी परेशानी से गुजरना पड़ा है। इसी को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने सरकार पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया है।
