अपडेट:सिकासेर-कोडार लिंक प्रोजेक्ट: टेंडर में गुपचुप तरीके से जोड़ी गई शर्त, हाईकोर्ट में नई याचिका लगाने की तैयारी
बिलासपुर। प्रदेश में 2549 करोड़ रुपये की जल आपूर्ति और निर्माण से जुड़ी सिकासेर-कोडार लिंक योजना का टेंडर एक नए विवाद में उलझ गया है। मेसर्स ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में एक पुनर्विचार याचिका लगाने की पूरी तैयारी कर ली है। इसमें टेंडर प्रक्रिया की गड़बड़ियों और नियमों की अनदेखी का मुद्दा उठाया गया है।
इस प्रस्तावित याचिका के जरिए 10 अगस्त 2026 को दिए गए हाईकोर्ट के आदेश (WPC नंबर 4026/2026) को चुनौती दी जाएगी। याचिकाकर्ता का पक्ष है कि निविदा (NIT नंबर 01/SAC/2026-27) की जरूरी शर्तों को किनारे रखकर एक कंपनी को फायदा पहुंचाया गया और उसे L-1 घोषित कर दिया गया।
जेवी पर रोक, फिर भी मिल गई पात्रता
याचिका के ड्राफ्ट में बताया गया है कि टेंडर की शर्त 3.8(a) के तहत जॉइंट वेंचर (JV) की भागीदारी पूरी तरह से मना है। इसके बाद भी मूल्यांकन समिति ने एक कंपनी को मध्य प्रदेश जल निगम के पुराने प्रोजेक्ट के आधार पर योग्य मान लिया। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश दस्तावेजों के मुताबिक, एमपी जल निगम का वह काम 'DBL-SIPL (JV)' ने किया था, जिसमें संबंधित कंपनी की हिस्सेदारी केवल 65 प्रतिशत थी। याचिका में यह तर्क रखा गया है कि जब जेवी की मनाही है, तो 65 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले काम को 100 प्रतिशत निजी अनुभव कैसे मान लिया गया।
अदालत ने अपने 4 अगस्त के फैसले में पुराने अनुभव की जांच का काम टेंडर समिति पर छोड़ा था। लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कोई जटिल तकनीकी जांच नहीं है, बल्कि कागजों में दर्ज शर्तों के पालन का मामला है। इसलिए पूरे मामले की जांच वर्तमान समिति से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति को सौंपी जानी चाहिए।
कंडिका 1.3(b) का खेल में अधिकारियों की भूमिका
इस टेंडर में सबसे बड़ा पेंच वित्तीय शर्तों का है। क्लॉज 1.3(a) के तहत 1,019.94 करोड़ रुपये की वित्तीय क्षमता अनिवार्य की गई थी। वहीं, एक नई शर्त क्लॉज 1.3(b) के रूप में रखी गई, जिसमें औसत सालाना टर्नओवर 5,099.72 करोड़ रुपये होना चाहिए। यह रकम प्रोजेक्ट की मूल लागत से भी दोगुनी है।
मुख्य सचिव की 64वीं कार्यकारिणी बैठक में इस कंडिका 1.3(b) का कहीं कोई जिक्र नहीं था। बैठक में जो दस्तावेज मंजूर हुए, उनमें तीन निविदाओं के लिए सिर्फ सामान्य शर्त 1.3(a) ही थी। लेकिन विभाग में फाइल आने के बाद, सिद्धनाथ बर्मन, आई.ए. सिद्दीकी और मुख्य अभियंता मक्सी कुजूर ने मिलकर सिकासेर-कोडार के टेंडर में 1.3(b) जोड़ दिया।
ई-फाइल पर आपत्ति आई, तो बना दी मैनुअल फाइल
जब निविदा आमंत्रित करने के लिए मुख्यमंत्री से मंजूरी लेनी थी, तब कार्यपालन अभियंता सिंघारे ने ई-फाइल में इन बदलावों पर आपत्ति दर्ज कराई। इसके चलते सचिव ने मक्सी कुजूर को फटकार लगाई और सिद्दीकी को बुलाकर समझाया। इसके बाद सिद्दीकी और मक्सी ने सिंघारे को दरकिनार करते हुए एक अलग मैनुअल (नगरी) फाइल तैयार की। इसे सचिव के जरिए मुख्यमंत्री से मंजूर कराकर टेंडर निकाल दिया गया। देवरगांव-मटनार और सिरपुर के टेंडरों में यह सख्त शर्त 1.3(b) नहीं डाली गई, यह सिर्फ सिकासेर-कोडार में लगाई गई ताकि दोनों क्लॉज आपस में विरोधाभासी बन जाएं और चुनिंदा कंपनियों को ही काम मिल सके।
याचिका में अदालत से रखी जाएंगी ये 4 मांगें
- नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी की तकनीकी पात्रता रद्द कर उसे टेंडर से बाहर किया जाए।
- दस्तावेजों और मूल्यांकन प्रक्रिया की जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति बने।
- 30 महीने के निर्माण कार्य और 5 साल के मेंटेनेंस के लिए जेवी अनुभव वालों को काम न सौंपा जाए।
- टेंडर की वित्तीय शर्तों (1.3a और 1.3b) की व्यावहारिक व्याख्या हो जिससे निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।
