कन्हार बांध विस्थापन फंड में 18 करोड़ का घोटाला: अफसरों को बचाने प्रमुख अभियंता कार्यालय में दबा दी गई फाइल, राजेश सुकुमार टोप्पो की भूमिका भी ...........

कन्हार बांध विस्थापन फंड में 18 करोड़ का घोटाला: अफसरों को बचाने प्रमुख अभियंता कार्यालय में दबा दी गई फाइल, राजेश सुकुमार टोप्पो की भूमिका भी ...........

अंबिकापुर। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बन रहे कन्हार अंतर्राज्यीय सिंचाई बांध के प्रभावितों के हक के पैसों में 18 करोड़ रुपये से ज्यादा की हेराफेरी का मामला अब एक बड़े सरकारी संरक्षण के खेल में तब्दील हो गया है। हसदेव गंगा कछार अंबिकापुर के मुख्य अभियंता ने इस पूरे फर्जीवाड़े को पकड़ते हुए 11 मार्च 2026 को दोषियों पर कड़ी विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की थी। लेकिन अब सामने आ रहा है कि प्रमुख अभियंता कार्यालय में बैठे किसी खुर्राट अफसर ने यह फाइल ही दबा दी है और अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अघोषित रोक लगा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जल संसाधन विभाग में ऊंचे पद पर बैठा वह कौन सा अफसर है जो मुख्यमंत्री के प्रभार वाले इस विभाग की गंदगी को साफ नहीं होने देना चाहता और सीएम की साख पर दाग लगा रहा है।
सोनभद्र जिले के अमरवाड़ में स्थित इस कन्हार बांध परियोजना का इतिहास दशकों पुराना है। 1973 में इसकी प्रशासकीय स्वीकृति महज 17 करोड़ रुपये की थी, जो अब छलांग लगाकर 2257.13 करोड़ के पार हो चुकी है। इस बांध के डूब क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के छह गांव—त्रिशूली, झूरा, कुशफर, सेमरवा, कामेश्वरनगर और पौली—आ रहे हैं। प्रभावित ग्रामीणों के पुनर्वास और जमीन हस्तांतरण के लिए यूपी के पिपरी खण्ड ने 2015 से 2017 के बीच बैकुंठपुर जल संसाधन संभाग को 70.34 करोड़ रुपये का डिपॉजिट फंड दिया था।
दस्तावेजों में शर्त साफ थी कि यह पूरा पैसा सिर्फ कन्हार के विस्थापितों पर खर्च होगा। लेकिन कुर्सी पर बैठे तत्कालीन अफसरों ने सक्षम अधिकारियों से अनुमति लेना जरूरी नहीं समझा और करीब 18.10 करोड़ रुपये नियमों को दरकिनार कर गैर-प्रयोजन मद में उड़ा दिए। इस सरकारी लूट में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता यू.एस. राम, सेवानिवृत्त वी.एस. साहू और प्रभारी ईई एस.के. दुबे समेत संभागीय लेखाधिकारी धरमेन्द्र सिंह, राजू नगड्वार, कमलेश सिंह, विकास कुमार विसाल, संजीव कुमार तिवारी और रिटायर्ड वरिष्ठ लेखा लिपिक ए.के. मित्रा के नाम जांच रिपोर्ट में सामने आए हैं।
मुख्य अभियंता ने इन सभी पर एक्शन के लिए जल संसाधन विभाग के प्रमुख अभियंता को पत्र भेजा था, लेकिन सारा खेल मुख्यालय स्तर पर खेला जा रहा है। विभाग में चर्चा है कि भ्रष्टाचारियों की फाइल मंत्रालय तक न पहुंचने देने के एवज में हर एक दागी अफसर से मोटी रकम वसूली जा रही है। फाइल दबाकर इन भ्रष्ट अफसरों के काले कारनामों पर पर्दा डाला जा रहा है।
इस पूरी लीपापोती में अब सबसे बड़ा सवाल राजेश सुकुमार टोप्पो को लेकर उठ रहा है। क्या वे यह नहीं चाहते कि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाले ये शातिर चेहरे बेनकाब हों? या फिर वे खुद इस पूरे खेल में शामिल हैं? विभागीय गलियारों में यह सुगबुगाहट तेज है कि क्या राजेश कुमार टोप्पो इस खेल का हिस्सा बनकर 'मोदी की गारंटी' को फेल करने और मुख्यमंत्री की सुशासन सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति को बदनाम करने में लगे हुए हैं।
हैरानी इस बात की है कि भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने और उन्हें सजा दिलाने के बजाय, उन्हें बचाने और गोदी में बैठाने का काम किया जा रहा है। हालात ये हैं कि इस मामले में दागियों को महफूज रखने के लिए विधानसभा तक में गलत और भ्रामक जानकारी परोसी जा रही है। एक तरफ विस्थापित अपने हक के लिए परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर भ्रष्ट अफसरों को बचाने के लिए पूरा सिस्टम ही ढाल बन गया है।

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