चीफ इंजीनियर आलोक अग्रवाल पर गंभीर आरोप: आदिवासी मानचित्रकार को दी भद्दी जाति सूचक गालियां
सुशासन" में भी आदिवासियों को नहीं मिल रहा न्याय, मुख्य अभियंता पर लगे दुर्व्यवहार के आरोप
रायपुर । राजधानी रायपुर में जल संसाधन विभाग के प्रमुख अभियंता जो पूर्व में आय से अधिक मामले में फंसे हुए हैं और अभी आरोपी भी है और वर्तमान में बिलासपुर जिला न्यायालय में मामला विचाराधीन है जिनका नाम है आलोक अग्रवाल के द्वारा आदिवासी मानचित्रकार, दिलीप सिंह पैंकरा, को जातिगत गंदी-गंदी गाली देने और अपमानित करने का मामला प्रकाश में आया है
यह घटना तब सामने आई जब पैंकरा ने थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मामले की जांच शुरू की गई। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब राज्य में एक आदिवासी मुख्यमंत्री है। और आदिवासी ही जल संसाधन मंत्री भी ऐसे मामले राज्य सरकार पर ऊंगली उठाना लाजमी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जल संसाधन विभाग, शिवनाथ भवन, नवा रायपुर में पदस्थ मानचित्रकार दिलीप सिंह पैंकरा ने दिनांक 25.04.2025 को एक लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के अनुसार, दिनांक 24.04.2025 को लगभग 11:15 बजे प्रमुख अभियंता आलोक अग्रवाल ने उन्हें अपने कक्ष में बुलाया और "अबे साले आदिवासी तुमको बुलाने के लिये अलग से आदेश करवाना पडेगा क्या, नीच कहीं का साले तुम आदिवासी को जगदलपुर भेज दूंगा" जैसे जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। पैंकरा ने अपने शिकायत में यह भी बताया कि उस समय कक्ष में फिरंगी लाल उइके (मानचित्रकार) और जयंत यादव (सहायक मानचित्रकार) भी उपस्थित थे, जो इस घटना के गवाह हैं। पैंकरा ने आरोप लगाया है कि अग्रवाल ने उनकी जाति को जानते हुए उन्हें अपमानित करने के इरादे से यह दुर्व्यवहार किया।
हालांकि, बाद में पूरे मामले को सेटल कर लिया गया और गवाह भी चीफ इंजीनियर के रसूख के सामने टूट गए । बाद में गवाह फिरंगी लाल उइके और जयंत यादव ने अपने बयानों को तोड़ मरोड़ के पेश किया और कहा कि आलोक अग्रवाल ने उन्हें केवल "शासकीय कार्य अधिक हो गया है सभी को मिलकर करना है" कहते हुए नाराजगी व्यक्त की थी और दिलीप सिंह पैंकरा को कोई जातिगत गाली-गलौज नहीं की थी। इधर प्रमुख अभियंता आलोक अग्रवाल ने भी अपने बयान में सभी आरोपों को निराधार और असत्य बताते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया । आलोक अग्रवाल ने कहा कि उसने किसी भी प्रकार की गाली-गलौज या गलत शब्द का प्रयोग नहीं किया।
इसके बाद जांच में भी मामले को खत्म कर दिया गया
जांच में यह बताया गया कि आवेदक द्वारा अपनी जाति का लाभ प्राप्त करने के आशय से बढ़ा-चढ़ाकर शिकायत पत्र दिया गया है और अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत किसी अपराध का घटित होना नहीं पाया गया। इसलिए, शिकायत पत्र को नस्तीबद्ध करना उचित माना गया है। लेकिन मामले की सच्चाई सामने नहीं आ पाई और आदिवासी न्याय से वंचित हो गयायह मामला राज्य में सुशासन के दावों पर सवाल खड़ा करता है, खासकर जब राज्य में एक आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद, आदिवासियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लग रहे हैं और उन्हें न्याय मिलने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। भले ही जांच में शिकायत को नस्तीबद्ध करने की सिफारिश की गई हो।
क्या कहता है कानून.....
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 में उन लोक सेवकों के लिए दंड का प्रावधान है जो अधिनियम के तहत अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं, विशेष रूप से ऐसे लोक सेवक जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य नहीं हैं। यह लापरवाही, अगर जानबूझकर की गई हो, तो छह महीने से लेकर एक साल तक की कैद की सजा हो सकती है। विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय के पास ऐसी लापरवाही का संज्ञान लेने और दंडात्मक कार्यवाही शुरू करने का अधिकार है
