मंत्रियों की नहीं सुन रहे अफसर, कमीशन के खेल में मरीजों की जान से भी खिलवाड़

मंत्रियों की नहीं सुन रहे अफसर, कमीशन के खेल में मरीजों की जान से भी खिलवाड़

रायपुर l सरकारी अस्पतालों की ख़राब हालत कोई मज़बूरी नहीं बल्कि विभाग में तैनात जनता के ही रक्षक है जो अपना जमीर बेच कर पैसा कमाने की अंधी दौड़ में शामिल हो गए है l हमारी पड़ताल में एक ऐसा सिंडिकेट सामने आया है जिसने पूरे स्वास्थ्य विभाग को अपनी जागीर बना लिया है।विभाग में बैठे रसूखदार अफसर कमीशन के लिए मासूम बच्चों और गरीब मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। हालात ये हैं कि सीजीएमएससी के एमडी रितेश कुमार अग्रवाल ने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री और वित्त मंत्री के आदेशों को भी दरकिनार कर दिया है l 

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क्या है दवाओं का पूरा गोलमाल

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राज्य सरकार ने वर्ष 2022 और 2023 के लिए आयुर्वेदिक दवाओं के लिए निविदा जारी की थी । नियमनुसार विशेष परिस्थिति में एमडी इस प्रक्रिया को 6 महीने बढ़ा सकते थे। मगर यहाँ नियमो का पालन नहीं हुआ बाद में पूरी फाइल स्वास्थ्य सचिव स्वास्थ्य मंत्री और वित्त मंत्री को भेजी गई। जिसमे जाँच के बाद सरकार ने 24 जुलाई 2026 को आदेश जारी किया कि पुरानी दरों पर टेंडर को 6 महीने और बढ़ाया जाए। मगर विभाग के एमडी रितेश अग्रवाल ने इस आदेश को दरकिनार कर दिया । हालत ये है कि सरकारी आदेश जारी होने के 20 दिन बाद फाइलें टस से मस नहीं हुई है l अब पूरी प्रक्रिया ठन्डे बस्ते में है l 

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नई कंपनियों को ठेका देने रची गई है साजिश

हमारी पड़ताल में ये बात सामने आई है कि पूरा मामला कमीशन के इर्द गिर्द घूम रहा हैl पुराने टेंडर की जगह नई दवा कंपनियों को ठेका देने की जमीन तैयार की जा रही है। विभागीय सूत्र बताते है कि अपात्र कंपनियों के अपूर्ण दस्तावेजों को पास करने के लिए छोटे कर्मचारियों पर दबाव बनाया जा रहा है। यदि नया टेंडर पास होता है तो दवाओं के कीमत 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाने को अनुमान है ।यदि ऐसा हुआ तो सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान होगा l 

जमीनी स्तर और वैक्सीन नहीं है उपलब्ध 

प्रदेश के अस्पतालों में पिछले डेढ़ साल से आयुर्वेदिक दवाएं नहीं खरीदी गई हैं। सीजीएमएससी के वेयरहाउस पूरी तरह खाली पड़े हैं। राजधानी से दूर महासमुंद जिले की जमीनी पड़ताल की तो वहां रोटावायरस वैक्सीन का भारी कमी मिली । पिछले दो तीन महीनों से यह वैक्सीन पूरी तरह खत्म है। जिले को हर साल करीब 15 हजार डोज चाहिए पर स्वास्थ्य केंद्रों में एक बूंद तक नहीं है। यह वैक्सीन छोटे बच्चों को जानलेवा डायरिया और डिहाइड्रेशन से बचाती है। गरीब ग्रामीण परिवार इसे प्राइवेट अस्पतालों में जाकर लगवाने की हैसियत बिल्कुल नहीं रखते। समय पर टीका न लगने से नौनिहालों की जान खतरे में है।

सफेद कोट में छिपा है असली माफिया

प्रदेश के बड़े सरकारी अस्पतालों और मेकाहारा की हालत किसी कबाड़खाने जैसी कर दी गई है। टॉयलेट में गंदगी का अंबार है पीने का साफ पानी नहीं है। आपातकालीन वार्डों में मरीजों की भारी भीड़ है पर डॉक्टरों की कमी से मरीज ठंडे फर्श पर पड़े हैं। करोड़ों की नई मशीनें धूल फांक रही हैं क्योंकि उन्हें चलाने वाले ऑपरेटर ही नहीं हैं। पूरा अस्पताल संविदा कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है।

पड़ताल में सामने आया कि कई नेता और आईपीएस अफसरों के रिश्तेदार पार्टनरशिप में बड़े प्राइवेट हास्पिटल संचालित कर रहे हैं l यही कारण है कि सरकारी अस्पतालों को सुविधाओ से वंचित रखा जा रहा है। मरीजों को डराकर इन्ही प्राइवेट अस्पतालों में रेफर किया जाता है। जो जीवन रक्षक इंजेक्शन बाजार में 1500 रुपये का है उसे 2500 रुपये में बेचा जा रहा है। धन्वंतरि मेडिकल स्टोर भी सफेद हाथी बन गए हैं। सरकारी डॉक्टर जानबूझकर महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं।

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