केंद्र से पैसा आया, फिर भी खड़ी हैं 9 फूड टेस्टिंग वैन, 25 हजार के फंड में कैसे होगा 90 हजार का काम?
रायपुर। खाने-पीने की चीजों में मिलावट पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने फंड तो भेज दिया है, लेकिन राज्य में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की 9 फूड मोबाइल यूनिटें पिछले तीन महीने से अपनी जगह पर खड़ी हैं। बाजार में दूध, खाद्य तेल, मिठाई और अन्य जरूरी चीजें बिना किसी जांच के बिक रही हैं। इन मोबाइल लैब का मुख्य काम मौके पर जाकर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता परखना था, लेकिन अब यह काम पूरी तरह से रुक गया है।
राज्य के करीब नौ जिलों में इन फूड मोबाइल यूनिटों को चलाया जाना था। इसके लिए केंद्र की ओर से राशि भी जारी कर दी गई है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हर जिले को शुरुआती संचालन के लिए सिर्फ 25-25 हजार रुपये ही दिए गए हैं। दूसरी ओर, जानकारी के अनुसार एक टेस्टिंग वैन को चलाने में हर महीने लगभग 90 हजार रुपये का खर्च आता है। इस खर्च में लैब टेक्नीशियन, लैब असिस्टेंट और ड्राइवर की सैलरी के साथ-साथ डीजल और अन्य जरूरी चीजें शामिल होती हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि जब खर्च 90 हजार रुपये है, तो सिर्फ 25 हजार में गाड़ियां कैसे चलेंगी? इसी वजह से यह पूरी योजना फिलहाल कागजों तक ही सिमट कर रह गई है।
इसके अलावा, इन वैन को चलाने के लिए जरूरी स्टाफ की भर्ती भी अब तक नहीं हो पाई है। विभागीय स्तर पर तीन साल की टेंडर प्रक्रिया अभी भी अटकी हुई है। स्टाफ और पूरे बजट की कमी के कारण सभी नौ यूनिटें इस समय काम नहीं कर रही हैं।
इस लेटलतीफी का असर रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई, कोरबा और धमतरी जैसे जिलों में ज्यादा देखने को मिल रहा है। योजना के मुताबिक इन जिलों में मोबाइल लैब के जरिए हर तीन महीने में खाने-पीने की चीजों की विशेष जांच का अभियान चलाया जाना था। लेकिन गाड़ियां खड़ी होने के कारण बाजार में मिलावटी सामान की ऑन-द-स्पॉट जांच नहीं हो पा रही है और आम जनता बिना जांचा हुआ सामान खरीदने को मजबूर है।
इस पूरे मामले में ड्रग एवं खाद्य प्रशासन के उप संचालक डोमेंद्र ध्रुव का कहना है कि फूड मोबाइल यूनिटों को शुरू करने की तैयारी चल रही है। केंद्र सरकार से जरूरी फंड मिल गया है और 15 जुलाई तक वैन को फील्ड में उतार दिया जाएगा।
अधिकारियों के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन तीन महीने से गाड़ियों का खड़ा रहना विभागीय सुस्ती को दिखाता है। जब तक स्टाफ की नियुक्ति नहीं होती और हर महीने आने वाले 90 हजार के खर्च का पूरा इंतजाम नहीं होता, तब तक लोगों को मिलावट से बचाने वाली यह योजना पूरी तरह से सफल नहीं हो पाएगी। अब देखना यह होगा कि 15 जुलाई तक प्रशासन इस रुकी हुई प्रक्रिया को कैसे पूरा करता है।
