सुशासन की सरकार में आबकारी का 'सिस्टम' हावी: एडिशनल कमिश्नर साहू और एलमा पर सरकार को बदनाम करने के आरोप, ट्रांसफर के बाद भी कुर्सियों पर जमे हैं अफसर

सुशासन की सरकार में आबकारी का 'सिस्टम' हावी: एडिशनल कमिश्नर साहू और एलमा पर सरकार को बदनाम करने के आरोप, ट्रांसफर के बाद भी कुर्सियों पर जमे हैं अफसर

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद भी आबकारी विभाग में अफसरों की मनमानी और काम करने का तरीका बदलने का नाम नहीं ले रहा है। कल तक जिस शराब घोटाले को लेकर कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार पर जमकर सवाल उठते थे और उन्हें कोसा जाता था, आज उसी आबकारी विभाग में पहले से भी ज्यादा भ्रष्टाचार होने की बातें सामने आ रही हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि महिला बाल विकास विभाग में हुए साड़ी घोटाले के जो सरताज थे, वे अब आबकारी विभाग में आकर यहां के भी सरताज बन बैठे हैं। यह ताजा उदाहरण बताता है कि सिस्टम में अफसरों की कितनी चल रही है।
सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, हाल ही में कवर्धा में शराब की ओवर रेटिंग का मामला सामने आया था। इस दौरान बैगा आदिवासियों से वसूली की गई और उनके साथ मारपीट व गाली-गलौज  की घटनाये सामने आई । इस पूरे मामले में रायजादा और साहू नाम के अफसरो पर आरोप लगे  थे। कायदे से इन दोनों पर कड़ी कार्रवाई होनी थी, लेकिन सिस्टम का खेल देखिए कि इन्हें सजा देने के बजाय उपकृत कर दिया गया। इन दोनों अफसरों को अच्छी जगहों और डिस्टलरी में नई पोस्टिंग दे दी गई है।
यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब राज्य में विष्णु देव साय की सरकार सुशासन और अपराध पर जीरो टॉलरेंस की बात करती है। भाजपा ने चुनाव में 'मोदी की गारंटी' का नारा देकर जनता का भरोसा जीता था। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की खुद की छवि एक साफ-सुथरे और ईमानदार नेता की रही है। लेकिन, आबकारी विभाग में चल रहे इस मनमाने खेल के कारण सरकार की छवि को नुकसान पहुंच रहा है। चर्चा है कि इस पूरे शराब भ्रष्टाचार और नए घोटाले के सरगना डिपार्टमेंट के एडिशनल कमिश्नर साहू और कमिश्नर पदुप सिंह एलमा ही हैं। बताया जा रहा है कि इन्हीं के इशारों पर यह सब हो रहा है, जिसकी वजह से मुख्यमंत्री की साफ-सुथरी छवि को जानबूझकर बदनाम किया जा रहा है।
विभाग में हालात इतने खराब हो गए हैं कि अब शासन के आदेशों का भी कोई मोल नहीं रह गया है। हाल ही में विभाग में जो ट्रांसफर आदेश जारी किए गए हैं, उनका कोई पालन नहीं कर रहा है। जिन अफसरों के तबादले हुए हैं, वे अपनी पुरानी जगहों से रिलीव नहीं हो रहे हैं और न ही अपनी नई जगहों पर जाकर ज्वाइन कर रहे हैं।
कहा जा रहा है कि ट्रांसफर आदेश का पालन न होने और इस मनमानी के पीछे भी एडिशनल कमिश्नर साहू का ही हाथ है। उनकी ही शह पर अफसर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं और अपने-अपने पदों पर जमे हुए हैं। कुल मिलाकर, जिस आबकारी विभाग को सुधारने की उम्मीद थी, वहां अभी भी पुराने तरीके से ही काम हो रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि इन अफसरों को आखिर किसका साथ मिला हुआ है, जो सुशासन के दावों को इस तरह चुनौती दे रहे हैं।

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