हाईवे पर स्टंट और सड़क पर बर्थडे: कोर्ट ने कहा- अब गाइडलाइन जरूरी, पुलिस की कार्रवाई सिर्फ वायरल वीडियो तक सीमित
बिलासपुर। सड़कों पर जान जोखिम में डालकर बाइक स्टंट करना और जन्मदिन मनाना अब सिर्फ सोशल मीडिया का ट्रेंड नहीं, बल्कि हाईकोर्ट की नजर में गंभीर जनसुरक्षा मुद्दा बन चुका है। चीफ जस्टिस कृष्ण राम महापात्र और जस्टिस संतोष शर्मा की डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि डीजीपी के निर्देशों से काम नहीं चलेगा। राज्य सरकार को ठोस गाइडलाइन बनानी होगी।
जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि समस्या तो सालों से बनी हुई है, लेकिन अभी तक कोई व्यवस्थित नीति नहीं बनी। 29 जनवरी 2025 को दैनिक भास्कर में छपी खबर पर कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। तब से लेकर अब तक कई बार जवाब मांगे गए। 24 अगस्त 2026 की सुनवाई में बिलासपुर एसएसपी का शपथपत्र पेश हुआ, जिसमें कोरी डैम के पास हुए स्टंट का जिक्र था। वीडियो वायरल होने के बाद ही पुलिस हरकत में आई, केस दर्ज किया, आरोपी को गिरफ्तार किया और बाइक जब्त की।
13 महीने में 26 से ज्यादा मामले, 80 गिरफ्तारियां
बिलासपुर पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले 13 महीनों में सड़क पर स्टंटबाजी, खतरनाक ड्राइविंग और सार्वजनिक जगह पर बर्थडे सेलिब्रेशन के 26 से ज्यादा मामले सामने आए। करीब 80 लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए गए आईटीएमएस कैमरे इनमें से किसी भी मामले को अपने आप नहीं पकड़ सके। लगभग हर कार्रवाई सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद ही हुई।
डीजीपी ने सभी जिलों के एसएसपी-एसपी को निर्देश जरूर दिए हैं कि स्टंट और बर्थडे रोकें, दोषियों पर तुरंत कार्रवाई करें और जागरूकता फैलाएं। पुलिस मुख्यालय ने कुछ निर्देश भी जारी किए। लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि ये निर्देश गाइडलाइन नहीं हैं। गाइडलाइन में साफ होना चाहिए कि स्टंट करने वालों पर क्या कार्रवाई होगी, कितनी सजा होगी, बाइक जब्त का प्रावधान क्या होगा और दोबारा गलती करने वालों के लिए क्या सख्ती बरती जाएगी।
कोर्ट की चिंता जायज है। हाईवे और व्यस्त सड़कों पर बाइक स्टंट न सिर्फ खुद स्टंट करने वाले की जान जोखिम में डालते हैं, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है। जन्मदिन मनाने के नाम पर सड़क जाम करना, आतिशबाजी करना या भीड़ इकट्ठा करना ट्रैफिक को बाधित करता है और दुर्घटनाओं को न्योता देता है।
राज्य सरकार ने मामले में समय मांगा है। अब देखना यह है कि गाइडलाइन कब आती है और क्या वह सिर्फ कागजी होती है या वाकई सड़कों को सुरक्षित बनाने में मदद करती है। पुलिस की मौजूदा व्यवस्था अगर सिर्फ वायरल वीडियो पर निर्भर रहेगी तो समस्या जड़ से नहीं सुलझेगी। कोर्ट का यह रुख साफ संकेत है कि अब सिर्फ निर्देशों से काम नहीं चलेगा, ठोस नीति और उसकी सख्ती से अमल जरूरी है।
