बिलासपुर पंजीयन कार्यालय में घूसखोरी: नाम में अंतर बताकर लौटाई रजिस्ट्री, फिर 25 हजार लेकर उसी दस्तावेज का कर दिया पंजीयन
बिलासपुर | शहर के रजिस्ट्री ऑफिस में लेनदेन और भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। यहां पदस्थ पंजीयक प्रतीक खेमका ने पहले एक प्रार्थी के दस्तावेज को नाम में अंतर का हवाला देकर लौटा दिया। इसके बाद उसी रजिस्ट्री को जब दूसरे दस्तावेज लेखक ने पेश किया, तो 25 हजार रुपये लेकर पंजीयन कर दिया गया। विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे काम के लिए बाहरी लोगों का सहारा लिया जा रहा है, ताकि रिश्वत का खेल आसानी से चलता रहे।
आधार कार्ड के नाम में बताया था अंतर
यह पूरा वाकया एक प्रार्थी की जमीन रजिस्ट्री का है। प्रार्थी जब अपना दस्तावेज लेकर कार्यालय पहुंचा, तो उसके अलग-अलग दस्तावेजों में नाम को लेकर विसंगति थी। प्रार्थी के आधार कार्ड में नाम 'नरसिम्हन मूर्ति' लिखा था, एक अन्य दस्तावेज में 'ए. मुर्ति' था और एक अन्य रिकॉर्ड में नाम 'ए. नरसिम्हन मूर्ति' दर्ज था। नामों में इसी अंतर को कारण बताते हुए पंजीयक प्रतीक खेमका ने 3 जुलाई 2026 को रजिस्ट्री करने से पूरी तरह मना कर दिया और प्रार्थी को वापस लौटा दिया।
दूसरे लेखक के आते ही 6 दिन में हो गई सेटिंग
रजिस्ट्री रुकने के बाद प्रार्थी ने दूसरे दस्तावेज लेखक से संपर्क किया। उसी खारिज किए गए दस्तावेज को 9 जुलाई 2026 को फिर से कार्यालय में पेश किया गया। सूत्रों का कहना है कि इस बार विनोद श्रीवास नाम के एक व्यक्ति के जरिए 25 हजार रुपये की घूस ली गई। पैसा मिलते ही पंजीयक ने बिना किसी आपत्ति के उसी दस्तावेज का पंजीयन कर दिया।
कार्यालय में सक्रिय हैं बाहरी लोग
सूत्रों से मिली जानकारी बताती है कि विनोद श्रीवास विभाग का कर्मचारी नहीं है, बल्कि एक बाहरी व्यक्ति है। उसे केवल रिश्वत की रकम लेने और बाहर से पूरी सेटिंग करने के लिए रखा गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी पर कोई आंच न आए और लेनदेन सुरक्षित तरीके से हो जाए। विभाग में विनोद श्रीवास की तरह दो अन्य बाहरी लोग भी सक्रिय हैं, जो लंबे समय से इसी तरह का काम करते आ रहे हैं।
सक्ती में बिना कलेक्टर की अनुमति के कर दी थी रजिस्ट्री
पंजीयक प्रतीक खेमका का लापरवाही और अनियमितता का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले सक्ती जिले में पदस्थापना के दौरान भी वे एक बड़ी गड़बड़ी कर चुके हैं, जिसके कारण उन्हें निलंबित होना पड़ा था। सक्ती में उन्होंने एक आदिवासी व्यक्ति की भूमि को बिना कलेक्टर की अनुमति के किसी गैर आदिवासी व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री कर दी थी।
शिकायत होने पर जब मामले की जांच की गई, तो यह खुलासा हुआ कि खेमका ने नियमों को ताक पर रखकर पंजीयन किया था। जांच रिपोर्ट के आधार पर संभागायुक्त ने कार्रवाई करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था। उस दौरान संभागायुक्त ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी कि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद अब बिलासपुर में यह नया मामला सामने आ गया है।
