आवेदन के प्रारूप में बाबू की गलती, सजा भुगत रहे प्रदेश के 50 से अधिक डीएनबी डॉक्टर; छह महीने से नहीं मिला वेतन
रायपुर। सरकारी अस्पतालों में सिस्टम की लापरवाही का खामियाजा अब मरीजों के साथ-साथ वहां दिन-रात ड्यूटी करने वाले डॉक्टरों को भुगतना पड़ रहा है। प्रदेश के अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में डीएनबी (डिप्लोमेट ऑफ नेशनल बोर्ड) की पढ़ाई और प्रशिक्षण ले रहे डॉक्टरों को पिछले छह महीने से स्टाइपेंड का भुगतान नहीं मिला है। आर्थिक तंगी से परेशान होकर रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और कोरिया जिले के कई डीएनबी डॉक्टरों ने अब अपना काम बंद कर दिया है। सिस्टम की इस सुस्त कार्यप्रणाली के कारण प्रदेशभर में 50 से अधिक डीएनबी डॉक्टरों ने सेवाएं रोक दी हैं। इनमें अकेले राजधानी रायपुर के 8 डॉक्टर शामिल हैं।
डीएनबी डॉक्टर अस्पतालों में मरीजों के इलाज के साथ-साथ अपनी दो साल की विशेषज्ञता की पढ़ाई पूरी करते हैं। इसके बदले शासन की ओर से उन्हें हर महीने निर्धारित स्टाइपेंड दिया जाता है। लेकिन पिछले छह महीने से इनकी फाइलें सरकारी कार्यालय में धूल फांक रही हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, स्टाइपेंड के भुगतान के लिए इस बार आवेदन का प्रारूप बदला गया था। इन डॉक्टरों को नए प्रारूप के तहत आवेदन करना था, लेकिन समय पर यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। जो सबसे बड़ी लापरवाही सामने आई है, वह यह है कि आवेदन के लिए इस्तेमाल किए गए प्रारूप में ही भारी त्रुटि रह गई थी। इसी गलती के कारण जब फाइल वित्त विभाग के पास पहुंची, तो वहां के अधिकारियों ने आपत्ति लगाकर फाइल लौटा दी और भुगतान पर पूरी तरह से रोक लगा दी।
डॉक्टरों के काम बंद करने से अस्पतालों में हालात बिगड़ने लगे हैं। डीएनबी डॉक्टरों की सेवाएं अस्पतालों में मरीजों की देखभाल, ओपीडी और वॉर्ड की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। इनके काम बंद कर देने से संबंधित विभागों में मरीजों की भीड़ बढ़ गई है और बाकी स्टाफ पर काम का दबाव काफी ज्यादा हो गया है। जिन अस्पतालों में ये डॉक्टर नियमित ड्यूटी दे रहे थे, वहां अब मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। मरीजों की परेशानी बढ़ गई है, लेकिन प्रबंधन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
आर्थिक परेशानी से जूझ रहे इन डॉक्टरों का कहना है कि वे अस्पतालों में अपनी नियमित ड्यूटी और प्रशिक्षण से जुड़े सभी काम पूरी जिम्मेदारी से करते आ रहे हैं। इसके बावजूद लंबे समय से स्टाइपेंड नहीं मिलने से उन्हें रोजमर्रा के खर्चे चलाने में भी भारी परेशानी हो रही है। कई डॉक्टरों ने अपनी इस समस्या को लेकर अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों के कार्यालय में कई बार दस्तक दी। अधिकारियों के सामने अपनी पूरी बात रखी, लेकिन भुगतान का रास्ता अब तक साफ नहीं हो पाया है। अधिकारी सिर्फ कागजी कार्यवाही का हवाला देकर मामले को टाल रहे हैं।
इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग (डीएचएस) के संजीव कुमार झा ने जानकारी दी है कि स्टाइपेंड भुगतान की प्रक्रिया लगभग पूरी होने वाली है और जल्द ही सभी डॉक्टरों को उनके रुके हुए पैसे का भुगतान कर दिया जाएगा।
