आयोग्य व्यक्ति को बनाने की तैयारी तकनीकी विश्वविद्यालय का कुलपति, इंटरव्यू के लिए बुलाया गया
आयोग्य व्यक्ति को बनाने की तैयारी इंजीनियरिंग महाविद्यालय का कुलपति, इंटरव्यू के लिए बुलाया गया
रायपुर। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश के एक प्रतिष्ठित तकनीकी विश्वविद्यालय में कुलपति पद पर एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति करने तैयारी चल रही है, जिसे न तो अपेक्षित शैक्षणिक योग्यता प्राप्त है और न ही प्रशासनिक अनुभव। इस नियुक्ति को लेकर छात्रों, शिक्षकों और शैक्षणिक समुदाय में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सरगुजा जिले के लखनपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में हाल ही में आर एन खरे को कुलपति के पद पर नियुक्ति करने इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है। लेकिन यह नियुक्ति शिक्षा विभाग के नियमों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के मानकों के अनुरूप नहीं है।
बता दें कि नियमों के अनुसार कुलपति पद के लिए कम से कम 10 वर्षों का प्रोफेसर स्तर का शिक्षण अनुभव, उल्लेखनीय शोध प्रकाशन, और विश्वविद्यालय स्तर पर प्रशासनिक कार्य का अनुभव अनिवार्य होता है। मगर प्रोफेसर आर एन खरे न केवल इन मानकों को पूरा नहीं करते, बल्कि उनके नाम पर कोई उल्लेखनीय अकादमिक शोध कार्य या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहचान भी दर्ज नहीं है।
नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे सवाल
विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव रहा। चयन समिति की अनुशंसा के बिना या महज़ औपचारिकता के तौर पर बैठक बुलाकर, कुछ विशेष राजनीतिक दबावों के तहत यह निर्णय लिया गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब कई योग्य और वरिष्ठ उम्मीदवार मौजूद थे, तो फिर इस पद पर एक अनुभवहीन और कम योग्य व्यक्ति को क्यों बैठाया गया?
छात्रों और शिक्षकों में रोष
इस विवादास्पद नियुक्ति के खिलाफ कॉलेज के कई छात्रों और शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किया है। छात्र संगठनों ने इसे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करार दिया है। उनका कहना है कि जब एक संस्था का सर्वोच्च पद ही गलत व्यक्ति के हाथों में होगा, तो शैक्षणिक गुणवत्ता और अनुशासन कैसे कायम रह पाएगा?
पूर्व में गंभीर आर्थिक अनियमितताओं का आरोप
डॉ. आर.एन. खरे के खिलाफ 7 मार्च 2019 को लखनपुर थाने में FIR दर्ज की गई थी। आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान फर्जी बिल, वित्तीय छेड़छाड़, और अन्य मदों की राशि का दुरुपयोग हुआ। ऐसे व्यक्ति को उच्च पद देने का प्रयास अब प्रशासनिक और नैतिक सवालों के घेरे में है।
क्या कहता है शिक्षा विभाग?
शिक्षा विभाग की ओर से अब तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। जब इस संबंध में उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने जवाब देने से इनकार कर दिया। हालांकि, सूत्रों की मानें तो विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारी इस नियुक्ति को लेकर खुद भी असहज हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण खुलकर कुछ कह नहीं पा रहे।
विशेषज्ञों की राय
शैक्षणिक विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में इस प्रकार की नियुक्तियां न केवल संस्थान की साख को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य को भी खतरे में डालती हैं। कुलपति पद एक प्रशासनिक नहीं, बल्कि शैक्षणिक नेतृत्व का दायित्व होता है, जिसे केवल योग्यता, अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर ही सौंपा जाना चाहिए।
