फर्जी डिग्री से बने फार्मासिस्ट, 3 साल से जांच अटकी: 62 में से सिर्फ 9 पहुंचे सलाखों के पीछे; जांच अधिकारी भी हुए रिटायर

फर्जी डिग्री से बने फार्मासिस्ट, 3 साल से जांच अटकी: 62 में से सिर्फ 9 पहुंचे सलाखों के पीछे; जांच अधिकारी भी हुए रिटायर

रायपुर | छत्तीसगढ़ फार्मेसी काउंसिल में फर्जी मार्कशीट और जाली अनुभव प्रमाण पत्र के सहारे सदस्यता हासिल करने का बड़ा खेल अब भी सरकारी फाइलों में दबा हुआ है। इस बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुए 3 साल बीत चुके हैं, लेकिन जांच अब तक पूरी नहीं हो पाई है। हालत यह है कि 62 लोगों के खिलाफ शिकायत हुई थी, जिनमें से सिर्फ 28 पर एफआईआर दर्ज हुई और महज 9 आरोपियों की गिरफ्तारी हो सकी।

इस बीच मामले की जांच कर रहे मुख्य अधिकारी भी रिटायर हो गए हैं। वहीं, थानों में स्टाफ बदलने से जांच की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। नतीजा यह है कि फर्जी तरीके से काउंसिल के सदस्य बने लोग अब भी सिस्टम की ढिलाई का फायदा उठा रहे हैं।

जांच कमेटी की रिपोर्ट का अता-पता नहीं

मार्च 2023 में जब यह मामला सामने आया था, तब हड़कंप मच गया था। शासन ने इस पूरे फर्जीवाड़े की जांच के लिए 3 सदस्यीय कमेटी बनाई थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस कमेटी ने अब तक न तो पुलिस को अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपी है और न ही शासन को। डीबी स्टार की पड़ताल में पता चला कि मुख्य जांचकर्ता के रिटायर होने के बाद मामला पूरी तरह ठंडे बस्ते में चला गया है। फार्मेसी काउंसिल के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें स्थिति की जानकारी है, लेकिन उनके पास आगे की कार्रवाई के लिए जरूरी रिपोर्ट ही नहीं है।

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राजस्थान और एमपी की यूनिवर्सिटी से खरीदीं डिग्रियां

 

जांच में यह बात सामने आई थी कि आरोपियों ने छत्तीसगढ़ फार्मेसी काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की निजी यूनिवर्सिटीज की फर्जी मार्कशीट का इस्तेमाल किया था।

 

 पकड़ी गई चोरी: जब काउंसिल ने संबंधित विश्वविद्यालयों को वेरिफिकेशन के लिए पत्र लिखा, तो वहां से जवाब आया कि ये डिग्रियां उनके यहां से जारी ही नहीं हुई हैं।

ऑनलाइन शॉपिंग: पूछताछ में कुछ आरोपियों ने कबूल किया कि उन्होंने ये डिग्रियां घर बैठे ऑनलाइन पैसे देकर खरीदी थीं।

मेडिकल स्टोर की आड़ में नशीली दवाओं का कारोबार

यह मामला सिर्फ कागजी हेराफेरी तक सीमित नहीं है। फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए सदस्यता लेने वालों पर गंभीर आरोप लगे थे। बताया जा रहा है कि इन लोगों ने फर्जी रजिस्ट्रेशन के आधार पर मेडिकल स्टोर चलाने का लाइसेंस लिया। आरोप है कि इन दुकानों की आड़ में नशीली दवाइयों का अवैध कारोबार किया जा रहा था। तात्कालिक रजिस्ट्रार ने तेलीबांधा थाने में इसकी शिकायत की थी, लेकिन पुलिस की कार्रवाई 9 गिरफ्तारियों के बाद आगे नहीं बढ़ पाई।

अफसर भी मौन

वर्तमान स्थिति यह है कि जिन 62 लोगों के खिलाफ शिकायत हुई थी, उनमें से आधे से ज्यादा पर तो अब तक एफआईआर भी नहीं हुई है। जिनकी गिरफ्तारी नहीं हुई, वे खुलेआम घूम रहे हैं। सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि फर्जी पाए जाने के बावजूद इन लोगों की सदस्यता अब तक निरस्त नहीं की गई है। इस पूरे मामले में जब जिम्मेदार अफसरों से सवाल किया गया, तो उनके पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था।

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