KTU इनसाइड स्टोरी: 91 दिन से बेघर हैं कुलपति, रविवि के धूल भरे रेस्टहाउस में कट रहे दिन... और इधर बैकडोर से चहेते प्रोफेसरों की हो रही झमाझम एंट्री!
रायपुर।छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय (KTU) में इन दिनों गजब का प्रशासनिक 'रायता' फैला हुआ है। जो यूनिवर्सिटी पूरे प्रदेश और देश को बेबाक पत्रकारिता और प्रभावी संचार का पाठ पढ़ाती है, उसकी अपनी आंतरिक व्यवस्थाएं ब्यूरोक्रेसी की भेंट चढ़ गई हैं। हालत यह है कि विश्वविद्यालय के मुखिया यानी नए कुलपति प्रो. मनोज दयाल पिछले तीन महीनों से अपने एक अदद सरकारी आवास के लिए सरकारी सिस्टम के आगे भटक रहे हैं।
धूल और शोर के बीच वीसी की रातें
20 फरवरी 2026 को बड़ी उम्मीदों के साथ पदभार ग्रहण करने वाले कुलपति महोदय को अंदाजा नहीं था कि सिस्टम उनका ऐसा स्वागत करेगा। ज्वाइनिंग के महज दो दिन बाद ही कुलपति कार्यालय ने संबंधित विभाग और सचिव को आवास के लिए विधिवत पत्र लिख दिया था। लेकिन मंत्रालय की लालफीताशाही में वह फाइल कहां जाकर धूल खा रही है, यह बताने वाला कोई नहीं है। मजबूरी का आलम यह है कि वीसी साहब पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (रविवि) के रेस्टहाउस में दिन गुजारने को विवश हैं। सोने पे सुहागा यह है कि इस रेस्टहाउस में इन दिनों भारी-भरकम मरम्मत और निर्माण कार्य चल रहा है। दिन भर की थकान के बाद जब कुलपति वहां पहुंचते हैं, तो उन्हें सुकून के बजाय धूल-मिट्टी और शोर-शराबे का सामना करना पड़ता है।
अटक गईं अहम फाइलें और बैठकें
आवास न होने का यह मामला सिर्फ एक बंगले का नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर विश्वविद्यालय की प्रशासनिक और शैक्षणिक सेहत पर पड़ रहा है। एक वीसी का काम सिर्फ दफ्तर के आठ घंटों तक सीमित नहीं होता। शाम को या वीकेंड पर कई महत्वपूर्ण बैठकें, अतिथि शिक्षकों और बाहर से आने वाले डेलिगेशन के साथ चर्चाएं करनी होती हैं। रेस्टहाउस के एक छोटे से कमरे में यह सब कैसे संभव है? गोपनीय और अहम फाइलों का निपटारा प्रभावित हो रहा है। शिक्षा जगत में अब यह चर्चा आम हो गई है कि जब एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की फाइल इस तरह अटकी है, तो आम छात्रों और कर्मचारियों का क्या हाल होता होगा।
बैकडोर से चहेते प्रोफेसरों की एंट्री का खेल
इस पूरे वाकये में सबसे चौंकाने वाला एंगल तो कुछ और ही है। एक तरफ कुलपति महोदय अपने सरकारी आवास की फाइल आगे बढ़ाने के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विश्वविद्यालय में पर्दे के पीछे एक बड़ा खेल चल रहा है। अंदरखाने से पुख्ता खबर है कि यूनिवर्सिटी में चहेते प्रोफेसरों की बैकडोर एंट्री का रास्ता साफ किया जा रहा है। नियमों को ताक पर रखकर और उचित पारदर्शी प्रक्रिया को दरकिनार कर अपनों को उपकृत करने की इस गुपचुप तैयारी ने कैंपस का माहौल गरमा दिया है। लोगों का तंज है कि सिस्टम के पास वीसी को बंगला अलॉट करने का समय भले ही न हो, लेकिन चहेतों को पिछले दरवाजे से एंट्री दिलाने वाली फाइलों को पहिए लगे हुए हैं।कुल मिलाकर, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का वर्तमान परिदृश्य प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की एक कड़वी सच्चाई बयां कर रहा है। एक ओर बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता शीर्ष नेतृत्व है, तो दूसरी ओर नियमों की धज्जियां उड़ाकर होने वाली पिछले दरवाजे की भर्तियां। अब देखना यह है कि राज्य सरकार और राजभवन इस प्रशासनिक लेटलतीफी और बैकडोर एंट्री के इस गंभीर 'कॉकटेल' पर कब संज्ञान लेते हैं।
