छत्तीसगढ़ में 67 हजार गरीब परिवारों का निवाला छीना बिना बताए काट दिए कृषि मजदूर कल्याण योजना के नाम अब दफ्तरों के चक्कर काट रहे हितग्राही

रायपुर। छत्तीसगढ़ में दीनदयाल उपाध्याय भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। सरकार ने बिना किसी पूर्व सूचना के 67 हजार से ज्यादा गरीब परिवारों की आर्थिक सहायता रोक दी है। इन भूमिहीन मजदूरों को हर साल 10 हजार रुपए मिलते थे। अब अचानक सरकारी फाइलों में इन्हें अपात्र बता दिया गया है। जो लोग बरसों से इस योजना का लाभ ले रहे थे उनके खातों में इस बार पैसे नहीं आए। गरीब और मजदूर वर्ग अब अपने ही हक के पैसों के लिए परेशान है। वे सरकारी दफ्तरों के धक्के खाने को मजबूर हैं। यह सीधा सीधा गरीबों के पेट पर लात मारने जैसा कदम है। बड़े अधिकारियों ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए केवाईसी का बहाना बना दिया है। उनका कहना है कि आधार लिंक ना होने के कारण पैसे रुके हैं।

सबसे बड़ी हैरानी की बात तो यह है कि सरकारी सूची में आज भी हजारों लोग पात्र हैं। उनका सरकारी पंजीयन भी पूरी तरह सही है। इसके बावजूद उनके खाते खाली पड़े हैं। प्रशासन की इस घोर लापरवाही का सीधा खामियाजा मजदूर भुगत रहे हैं। ये वे लोग हैं जो रोज दिहाड़ी कमाते और खाते हैं। 25 मार्च को मुख्यमंत्री के माध्यम से 4 लाख 95 हजार लोगों को योजना की किश्त जारी की गई थी। इसके लिए कुल 500 करोड़ रुपए बांटे गए। पिछले साल यानी 2025 के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर अलग थी। तब 5 लाख 62 हजार लोगों को 562 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया था। इसका साफ मतलब है कि इस साल 67 हजार से ज्यादा लोगों का नाम लिस्ट से गायब कर दिया गया। इन गरीबों को भनक तक नहीं लगने दी गई कि अब उन्हें सरकारी मदद नहीं मिलेगी। वे बस इंतजार ही करते रह गए।

राजस्व विभाग के अफसरों का अपना अलग ही बेतुका तर्क है। उनका कहना है कि एक परिवार से सिर्फ एक ही व्यक्ति को पैसा मिलेगा। अफसरों का दावा है कि पहले एक ही परिवार के कई लोग इसका फायदा उठा रहे थे। विभाग ने 14 अलग अलग क्राइटेरिया तय किए हैं। इन पैमानों पर जो खरा नहीं उतरा उसे योजना से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। बैंक खाते का केवाईसी ना होना एक बड़ा कारण बताया जा रहा है। आधार कार्ड का सक्रिय ना होना भी वजह बताई गई है। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ नए नियम बनाने तक सीमित है। क्या इन गरीब और अनपढ़ मजदूरों को केवाईसी प्रक्रिया के बारे में जागरूक करना जमीनी प्रशासन का काम नहीं था। अब जब पैसे कट गए तो अधिकारी सिर्फ पंचायत जाने की सलाह दे रहे हैं। वे एसडीएम को लिखित आवेदन देने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं।

Read More Bihar Breaking: पुलिस हिरासत में युवक की मौत से भड़का गुस्सा, भीड़ ने हाईवे जाम कर पुलिस पर किया हमला

जमीनी हकीकत वातानुकूलित कमरों में बैठे अफसरों के दावों से बिल्कुल उलट है। रीवा गांव के रहने वाले ओमप्रकाश यदु और राम चरण पटेल इसके जीते जागते उदाहरण हैं। दीनानाथ साहू जैसे कई लोग भी सरकारी सिस्टम की इस नाकामी के शिकार हुए हैं। ओमप्रकाश की पंजीयन प्रक्रिया काफी पहले पूरी हो चुकी है। उनका नाम बाकायदा पात्र हितग्राहियों की सूची में दर्ज है। लेकिन इसके बाद भी उनके बैंक खाते में एक भी रुपया नहीं आया। इसी तरह राम चरण पटेल और दीनानाथ साहू को 2021 से लगातार इस योजना का पैसा मिल रहा था। इस बार उन्हें भी बिना कोई कारण बताए खाली हाथ छोड़ दिया गया है। चितरेखा साहू और रजनीकांत बंजारे भी इसी सरकारी लेटलतीफी के शिकार हुए हैं। चितरेखा को 2021 से लेकर 2025 तक हर साल पैसा मिला। 2026 की नई लिस्ट में भी वह पूरी तरह पात्र हैं। फिर भी उनके खाते में पैसा नहीं पहुंचा और अब वह परेशान घूम रही हैं।

Read More छत्तीसगढ़: दो यूनिवर्सिटी को मिले नए कुलपति, जम्मू से रायगढ़ आएंगे प्रोफेसर विनय चौहान; पटेरिया अब बिलासपुर की कमान संभालेंगे

यह योजना मुख्य रूप से भूमिहीन मजदूरों और वनोपज संग्राहकों के लिए शुरू की गई थी। इसमें चरवाहे बढ़ई लोहार मोची नाई धोबी और अनुसूचित क्षेत्रों के पुजारी शामिल हैं। यह समाज का वह वर्ग है जिसके पास आमदनी का कोई पक्का जरिया नहीं होता है। ऐसे में 10 हजार रुपए की सालाना मदद इनके लिए बहुत बड़ी रकम होती है। इससे वे अपनी कई जरूरतें पूरी करते हैं। अब इस रकम के अचानक रुकने से इन परिवारों का पूरा बजट बिगड़ गया है। उन्हें कर्ज लेने की नौबत आ गई है। रायपुर के कलेक्टर डॉ गौरव सिंह का इस पूरे मामले पर रटा रटाया जवाब आया है। उनका कहना है कि वह इसकी जांच करवाएंगे। शिकायतें एसडीएम को भेज दी गई हैं। लेकिन यह रस्मी सरकारी जवाब उन मजदूरों के लिए कोई राहत नहीं है। उन्हें आज अपने घर का खर्च चलाने के लिए इन पैसों की सख्त जरूरत है।

प्रशासन का यह रवैया बेहद असंवेदनशील और अमानवीय है। गरीबों की मदद के लिए बनी यह योजना अब उनके लिए परेशानी का सबब बन गई है। आवेदन देने और जांच के नाम पर मजदूरों को बाबूगिरी के जाल में उलझा दिया गया है। जो मजदूर दिन भर काम करके अपना परिवार पालता है वह अब अपनी दिहाड़ी छोड़ रहा है। वह एसडीएम दफ्तर और पंचायत के चक्कर काट रहा है। सरकार को चाहिए कि वह तुरंत इस गंभीर मामले में दखल दे। तकनीकी खामियों और पोर्टल की गड़बड़ियों का ठीकरा गरीबों के सिर नहीं फूटना चाहिए। प्रशासन अपनी व्यवस्था को तुरंत दुरुस्त करे। जो लोग पात्र हैं उनके खातों में जल्द से जल्द बिना किसी देरी के पैसा डाला जाना चाहिए। तभी इस कल्याणकारी योजना का असली मकसद पूरा हो सकेगा और गरीबों को उनका वाजिब हक मिल सकेगा।

लेखक के विषय में

मनीशंकर पांडेय Picture

मणिशंकर पांडेय National Jagat Vision के संस्थापक, मालिक एवं मुख्य संपादक हैं। वे निष्पक्ष, सटीक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य देश-दुनिया की सच्ची और विश्वसनीय खबरें पाठकों तक पहुँचाना है।

More News

Raipur Gambling Raid: खेतों में चल रहा था लग्जरी जुआ अड्डा, पुलिस की रेड में मर्सिडीज समेत लाखों कैश जब्त

राज्य

Excise Policy Case: कोर्ट में केजरीवाल का बड़ा दांव- ‘मैं खुद लड़ूंगा केस’, CBI ने जताई कड़ी आपत्ति Excise Policy Case: कोर्ट में केजरीवाल का बड़ा दांव- ‘मैं खुद लड़ूंगा केस’, CBI ने जताई कड़ी आपत्ति
नई दिल्ली: दिल्ली की कथित आबकारी नीति से जुड़े मामले में Arvind Kejriwal ने आज Delhi High Court में बड़ा...
दिल्ली विधानसभा में सुरक्षा में बड़ी सेंध: बैरियर तोड़कर अंदर घुसी कार, ड्राइवर फरार, हाई अलर्ट पर पुलिस
आंध्र प्रदेश में आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़: युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की साजिश, ‘खवातीन विंग’ का खुलासा
जोधपुर बना MD ड्रग तस्करी का हब: कॉलेज छात्रों को निशाना, गुजरात से बसों में आता था केमिकल
धनबाद में गैस सिलेंडर ब्लास्ट से हड़कंप: दम घुटने से दो की मौत, दो की हालत गंभीर