तलाक के बाद बदला नाम तो डिग्रियों में भी मिलेगी पहचान, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

तलाक के बाद बदला नाम तो डिग्रियों में भी मिलेगी पहचान, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर : शादी के बाद बदला नाम और तलाक के बाद फिर अपनी पुरानी पहचान पाने की जद्दोजहद सिर्फ नाम बदलने का मामला नहीं, बल्कि एक महिला के अधिकार, सम्मान और भविष्य से जुड़ा मामला है। इस मामला पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि वैवाहिक स्थिति बदलने के बाद किसी महिला को उसके मूल नाम से पहचान पाने के लिए शैक्षणिक संस्थानों के चक्कर काटने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। डिग्रियों में नाम सुधारने के लिए नियमों की आड़ लेकर इनकार करना उचित नहीं है।

जस्टिस ए के प्रसाद की एकलपीठ ने बिलासपुर के शासकीय बिलासा कन्या महाविद्यालय के उस फैसले को निरस्त कर दिया है, जिसमें महिला के शैक्षणिक दस्तावेजों में उसका मूल नाम बहाल करने की मांग खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने कॉलेज प्रबंधन को जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर संशोधित डिग्रियां जारी करने का निर्देश दिया है। इसके लिए 6 सप्ताह की समयसीमा भी तय की गई है।

सुहाना से बनी सुरभि, तलाक के बाद फिर अपनाया पुराना नाम

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मामला बिलासपुर निवासी सुरभि यादव से जुड़ा है। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा मूल नाम सुरभि यादव से पूरी की थी। वर्ष 2012 में राजिक अहमद अंसारी से विवाह के बाद उनका नाम बदलकर सुहाना अंसारी हो गया। इसके बाद उन्होंने इसी नाम से शासकीय बिलासा कन्या महाविद्यालय से बीएससी, एमएससी और अन्य डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की पढ़ाई पूरी की। कॉलेज से जारी सभी शैक्षणिक दस्तावेजों में उनका नाम सुहाना अंसारी दर्ज हो गया, लेकिन वर्ष 2022 में फैमिली कोर्ट ने उनकी शादी को कानूनी रूप से निरस्त कर दिया। इसके बाद उन्होंने सरकारी दस्तावेजों में अपनी पुरानी पहचान बहाल कराने की प्रक्रिया शुरू की। आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र सहित अन्य दस्तावेजों में उनका नाम फिर सुरभि यादव दर्ज हो गया। परेशानी तब खड़ी हुई, जब शैक्षणिक डिग्रियों में नाम बदलवाने की बारी आई।

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एक नाम, दो दस्तावेज, नौकरी की राह में बाधा

सरकारी दस्तावेजों में सुरभि यादव और शैक्षणिक डिग्रियों में सुहाना अंसारी नाम दर्ज होने से उनकी पहचान को लेकर विसंगति पैदा हो गई। इसका सीधा असर उनके रोजगार के अवसरों पर पड़ने लगा। सरकारी नौकरी के आवेदन और दस्तावेज सत्यापन के दौरान अलग-अलग नाम होने से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा। जिस पढ़ाई और योग्यता के दम पर उन्हें आगे बढ़ना था, वही डिग्रियां उनके लिए अड़चन बन गईं।

सुरभि ने कॉलेज प्रबंधन और विश्वविद्यालय के समक्ष नाम संशोधन की मांग रखी, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। पहले हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी कॉलेज की शासी निकाय ने उनका आवेदन निरस्त कर दिया। आखिरकार उन्हें दोबारा हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। इस बार अधिवक्ता अविनाश के मिश्रा ने उनकी ओर से पक्ष रखते हुए बताया कि वैवाहिक स्थिति बदलने के बाद मूल नाम बहाल हो चुका है और शैक्षणिक दस्तावेजों में अलग नाम बने रहने से उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है।

नियमों से बड़ा नहीं व्यक्ति का कानूनी अधिकार

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने रिकॉर्ड की प्रामाणिकता बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति की बदली हुई कानूनी स्थिति को नजरअंदाज कर दिया जाए। केवल इसलिए नाम संशोधन से इनकार नहीं किया जा सकता कि परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद बदलाव के लिए नियमों में स्पष्ट प्रावधान नहीं है। अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण बात कही कि नाम में संशोधन से महिला की शैक्षणिक योग्यता, प्राप्त अंक, श्रेणी या पढ़ाई की अवधि में कोई बदलाव नहीं हो रहा है। ऐसे में वास्तविक परिस्थितियों और कानूनी स्थिति को देखते हुए उसके आवेदन पर विचार करना जरूरी है। संस्थान प्रक्रिया और औपचारिकताओं का पालन करा सकते हैं, लेकिन महज नियमों की अनुपस्थिति को आवेदन खारिज करने का आधार नहीं बना सकते।

6 सप्ताह में पूरी करनी होगी प्रक्रिया

हाईकोर्ट ने बिलासा कन्या महाविद्यालय के आवेदन निरस्त करने संबंधी फैसले को खारिज करते हुए निर्देश दिया है कि कॉलेज प्रबंधन आवश्यक शपथ पत्र, निर्धारित शुल्क और राजपत्र (गजट) प्रकाशन जैसी औपचारिकताएं पूरी कराकर सुरभि यादव के मूल नाम से संशोधित शैक्षणिक डिग्रियां जारी करे। अटल विश्वविद्यालय को भी इस प्रक्रिया में आवश्यक सहयोग करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर पूरी कार्यवाही करने की समयसीमा तय की है।

यह फैसला उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण राहत लेकर आया है, जिन्हें विवाह के बाद बदली पहचान और तलाक के बाद मूल नाम की बहाली के बीच सरकारी व शैक्षणिक दस्तावेजों में विसंगति का सामना करना पड़ता है। हाईकोर्ट के फैसले ने यह संदेश दिया है कि किसी महिला की कानूनी पहचान और उसके अधिकारों को केवल संस्थागत नियमों की आड़ में अधर में नहीं छोड़ा जा सकता। 

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