पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में अयोग्य प्रोफेसरों की नियुक्ति पर हाईकोर्ट सख्त, कुलपति को दो महीने में फैसला लेने का अल्टीमेटम

पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में अयोग्य प्रोफेसरों की नियुक्ति पर हाईकोर्ट सख्त, कुलपति को दो महीने में फैसला लेने का अल्टीमेटम

रायपुर। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सालों से मलाई काट रहे अयोग्य शिक्षकों की अब खैर नहीं है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय में नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियों के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। डॉ. शिवकृपा मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कुलपति और प्रशासन को दो टूक कहा है कि वे लंबित शिकायतों पर कानून के हिसाब से दो महीने के भीतर फैसला लें। इस आदेश के बाद अब उन प्रोफेसरों की कुर्सी खतरे में नजर आ रही है जिन्होंने बिना जरूरी योग्यता के सालों से यूनिवर्सिटी पर कब्जा जमा रखा है।

न्यायधानी के इस आदेश से उन रसूखदारों की धड़कनें तेज हो गई हैं जो जांच समितियों की रिपोर्ट के बाद भी सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर लाखों रुपये वेतन डकार रहे हैं।

बिना नेट-पीएचडी बन गए एसोसिएट प्रोफेसर, छात्र हुए गायब

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विश्वविद्यालय के भीतर चल रहे इस खेल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिन पदों के लिए यूजीसी के कड़े नियम होते हैं, वहां जमकर रेवड़ियां बांटी गईं। डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने कोर्ट को बताया कि पत्रकारिता विभाग में पंकजनयन पाण्डेय को सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया गया, जबकि उनके पास न तो नेट/सेट है और न ही पीएचडी हालत यह है जिस विभाग में 40 सीटें हैं, वहां अयोग्य शिक्षकों की वजह से अब सिर्फ 4 से 5 छात्र ही दाखिला ले रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि पंकजनयन की नियुक्ति को कार्य परिषद पहले ही रद्द करने का आदेश दे चुकी है, फिर भी यूनिवर्सिटी उन्हें हर महीने लाखों रुपये वेतन बांट रही है।

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मेरिट वालों को अंधेरे में रख चहेतों को बांटी नौकरी

राजेंद्र मोहंती की नियुक्ति पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। आरोप है कि वे मेरिट लिस्ट में काफी पीछे थे, फिर भी उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए ऊपर के उम्मीदवारों को नियुक्ति की सूचना ही नहीं दी गई। उन्हें इंटरव्यू में 20 में से 19.50 अंक दे दिए गए ताकि वे रेस में आगे आ सकें। डॉ. शिवकृपा मिश्रा ने बताया कि इस तरह की धांधली ने पिछले 18 साल से पत्रकारिता की पढ़ाई का बेड़ा गर्क कर दिया है।

जांच में जो अयोग्य मिले, उन पर गिर चुकी है गाज

विश्वविद्यालय में चल रही इस सफाई मुहिम के तहत उच्च शिक्षा विभाग की जांच समिति पहले ही कई नियुक्तियों को गलत ठहरा चुकी है। इसी कड़ी में जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शहीद अली को बर्खास्त किया जा चुका है और उनकी जगह डॉ. प्रमोद जेना की नियुक्ति हुई है।

 

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