सीएम को भनक नहीं, अफसरों ने निकाला बीच का रास्ता; 600 शिक्षकों की पोस्टिंग अब डीईओ के भरोसे
रायपुर। प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग ने काफी इंतजार के बाद करीब 600 से 700 शिक्षकों की ट्रांसफर सूची जारी कर दी है। इस सूची ने शिक्षकों की परेशानी खत्म करने के बजाय और बढ़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि आसमान से गिरे और खजूर में लटके। विभाग ने तबादला तो कर दिया, लेकिन बड़ी संख्या में शिक्षकों को कोई स्कूल नहीं दिया गया है। उनकी नई पदस्थापना का फैसला "जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) के विकल्प" पर छोड़ दिया गया है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि तबादलों में गजेंद्र यादव की नहीं चली, जिसके बाद अफसरों ने अपना बीच का रास्ता निकाला। मुख्यमंत्री को अंधेरे में रखकर यह पूरी सूची तैयार कर दी गई।
पोर्टल पर जानकारी, फिर भी डीईओ पर निर्भरता क्यों?
शिक्षा विभाग के पोर्टल पर हर जिले में रिक्त और स्वीकृत पदों का पूरा विवरण ऑनलाइन उपलब्ध रहता है। इसके बावजूद 20 अलग-अलग आदेशों को मिलाकर जारी इस संयुक्त सूची में अधिकांश शिक्षकों की पदस्थापना किसी निर्धारित स्कूल में नहीं की गई है। अगर 28 में से 25 या 20 में से 18 शिक्षकों का स्कूल तय नहीं है, तो विभाग ने किस आधार पर इनका स्थानांतरण किया? यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि ऑनलाइन डाटा होने के बाद भी शिक्षकों की नई पोस्टिंग का जिम्मा डीईओ के विवेक पर क्यों डाल दिया गया। क्या लिस्ट निकालने से पहले खाली पदों का मिलान नहीं किया गया?
तबादले के बाद अब नई पोस्टिंग की दौड़
डीईओ के विकल्प का असल मतलब क्या है, इसकी कोई तय परिभाषा या गाइडलाइन आदेश में नहीं है। क्या डीईओ अपनी मर्जी से किसी भी स्कूल में पोस्टिंग दे सकते हैं? इसके लिए क्या मापदंड होंगे, यह किसी को नहीं पता। यदि काउंसलिंग के जरिए पदस्थापना होती या एकल शिक्षकीय स्कूलों को प्राथमिकता दी जाती, तो विवाद नहीं होता। अब ट्रांसफर पा चुके शिक्षक मनचाहे स्कूल के लिए प्रयास करेंगे। बिना स्पष्ट दिशा-निर्देशों के इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
ग्रामीण स्कूलों के खाली रहने का डर
सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों को हो सकता है। यदि डीईओ को बिना किसी सख्त नियम के पदस्थापना का अधिकार मिल गया है, तो शिक्षक शहरी या अपनी सुविधा वाले स्कूलों में जाने का प्रयास करेंगे। प्रशासनिक संतुलन बनाने की यह प्रक्रिया उल्टे ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकती है।
अधिकारियों ने क्या कहा....
विभाग के एक उच्चाधिकारी के अनुसार, जब पदों की स्थिति को लेकर कोई भ्रम हो, एक से ज्यादा विकल्प हों या किसी शिक्षक की कोई विशेष शारीरिक परेशानी हो, तब शैक्षिक हित में डीईओ के विकल्प वाली व्यवस्था अपनाई जाती है। वहीं, एक अन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इतनी बड़ी संख्या में डीईओ पर पोस्टिंग छोड़ना सामान्य नहीं है। नियमों के अनुसार डीईओ को पोस्टिंग से पहले विभाग से मार्गदर्शन लेना चाहिए। अब विभाग की परीक्षा यह है कि वह रिक्त पदों, वरिष्ठता और विषय की जरूरत के अनुसार पदस्थापना कैसे करता है।
