आदेशों के जाल में उलझी शिक्षा व्यवस्था! शनिवार की स्कूल टाइमिंग पर प्रदेशभर में भ्रम, शिक्षकों ने खोला मोर्चा

आदेशों के जाल में उलझी शिक्षा व्यवस्था! शनिवार की स्कूल टाइमिंग पर प्रदेशभर में भ्रम, शिक्षकों ने खोला मोर्चा

रायपुर: छत्तीसगढ़ में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही स्कूल शिक्षा विभाग एक बार फिर अपने आदेशों को लेकर विवादों में घिर गया है। शनिवार को स्कूल संचालन की समयावधि को लेकर प्रदेशभर में अलग-अलग व्यवस्थाएं देखने को मिल रही हैं। कहीं स्कूल सुबह लग रहे हैं, तो कहीं सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। इस असमंजस ने न केवल शिक्षकों बल्कि छात्रों और अभिभावकों के बीच भी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।

शिक्षक संगठनों का आरोप है कि विभागीय आदेशों में स्पष्टता और समन्वय की कमी के कारण स्कूलों में एकरूपता समाप्त हो गई है। उनका कहना है कि एक ओर सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर अलग-अलग निर्देशों के कारण जमीनी स्तर पर अव्यवस्था बढ़ती जा रही है। शिक्षकों का आरोप है कि फील्ड की वास्तविक परिस्थितियों को समझे बिना जारी किए जा रहे आदेश लगातार विवाद का कारण बन रहे हैं।

विवाद का सबसे बड़ा केंद्र शनिवार की स्कूल टाइमिंग बनी हुई है। शिक्षक नेताओं का कहना है कि पूर्व में जारी आदेशों के अनुसार शनिवार को सुबह स्कूल लगाने की व्यवस्था थी, ताकि योग, व्यायाम, खेलकूद और अन्य सह-शैक्षणिक गतिविधियां संचालित की जा सकें। लेकिन हालिया निर्देशों के बाद कई स्कूलों में शनिवार को भी सामान्य दिनों की तरह कक्षाएं लगाई जा रही हैं, जिससे इन गतिविधियों पर असर पड़ रहा है।

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शिक्षक संघों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि पहले से लागू आदेश मौजूद हैं, तो फिर नए निर्देश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी ? उनका मानना है कि बार-बार बदलते आदेशों से स्कूल प्रबंधन, शिक्षक और छात्र सभी प्रभावित हो रहे हैं। इसके चलते शिक्षा व्यवस्था में अनावश्यक भ्रम और प्रशासनिक अस्थिरता पैदा हो रही है, जिसका सीधा असर विद्यार्थियों की दिनचर्या और सीखने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

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अब शिक्षक संगठन मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जल्द स्पष्ट आदेश जारी नहीं किए गए तो विवाद और गहरा सकता है। फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिक्षा विभाग अपने ही आदेशों में उलझा क्यों नजर आ रहा है और आखिर इस भ्रम की स्थिति का खामियाजा छात्रों को, कब तक भुगतना पड़ेगा ?

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