शादीशुदा पुरुष से संबंध, फिर भी महिला को नहीं मिला घरेलू हिंसा कानून का संरक्षण, हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका
बिलासपुर : शादीशुदा पुरुष के साथ मंदिर में विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का दावा करने वाली महिला को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी महिला को पहले से पता हो कि पुरुष शादीशुदा है और उसकी पत्नी जीवित है, इसके बावजूद वह उसके साथ संबंध में रहती है, तो परिस्थितियों के आधार पर ऐसे रिश्ते को विवाह की प्रकृति वाला संबंध नहीं माना जा सकता। ऐसे में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत राहत पाने के लिए जरूरी घरेलू संबंध की शर्त भी पूरी नहीं होती।
जस्टिस एन के चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने सूरजपुर निवासी महिला की क्रिमिनल रिवीजन खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने यह भी पाया कि महिला और पुरुष ममेरे रिश्ते में थे। उनके बीच विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत प्रतिबंधित संबंध की श्रेणी में आता है। ऐसे रिश्ते में विवाह तभी मान्य हो सकता है, जब लागू कोई मान्य प्रथा इसकी अनुमति देती हो। मामले में ऐसी किसी प्रथा का प्रमाण नहीं दिया गया।
मंदिर में शादी का दावा, लेकिन कानूनी मान्यता पर सवाल
महिला ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि उसने उग्रनारायण सिंह के साथ मंदिर में शादी की थी। इसके बाद दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। महिला का तर्क था कि उनके बीच घरेलू संबंध स्थापित हो चुका था, इसलिए उसे घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 2(एफ) के तहत संरक्षण मिलना चाहिए। वहीं, पुरुष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने बताया कि उग्रनारायण सिंह का विवाह वर्ष 2000 में अनंत कुमारी से हो चुका था। इस विवाह से उनके दो बच्चे भी हैं। महिला को पहली शादी और बच्चों की जानकारी पहले से थी। ऐसे में पहली शादी कायम रहते दूसरी शादी को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
ममेरे रिश्ते में विवाह बना अहम आधार
हाई कोर्ट ने मामले में पाया कि महिला और पुरुष ममेरे रिश्ते में थे। ऐसे रिश्ते में विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत प्रतिबंधित संबंध की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विवाह को मान्यता तभी मिल सकती है, जब दोनों पक्षों पर लागू कोई वैध प्रथा या रूढ़ि इसकी अनुमति देती हो। इस मामले में ऐसी किसी प्रथा को साबित नहीं किया गया। कोर्ट के अनुसार, केवल साथ रहने या मंदिर में विवाह करने का दावा कर देने से किसी रिश्ते को कानून की नजर में विवाह की प्रकृति वाला संबंध नहीं माना जा सकता। इसके लिए संबंध की कानूनी स्थिति और उससे जुड़ी परिस्थितियों को देखना जरूरी है।
मजिस्ट्रेट से लेकर हाई कोर्ट तक गई, पर नहीं मिली राहत
महिला ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत राहत के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, सूरजपुर की अदालत में आवेदन प्रस्तुत किया था। 30 मार्च 2024 को मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ महिला ने अपील की, लेकिन द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर ने 8 दिसंबर 2025 को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद महिला ने हाई कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दायर कर दोनों आदेशों को चुनौती दी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और निचली अदालतों के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सिर्फ साथ रहना ही घरेलू संबंध नहीं
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 2(एफ) के अनुसार, घरेलू संबंध में ऐसे दो लोगों का रिश्ता शामिल है, जो एक ही घर में साथ रहे हों या रह चुके हों और जिनके बीच विवाह, खून का रिश्ता, गोद लेने या विवाह की प्रकृति वाला संबंध हो।
हाई कोर्ट के फैसले में स्पष्ट हुआ कि किसी पुरुष के साथ एक ही घर में रहने भर से घरेलू हिंसा कानून के तहत घरेलू संबंध स्थापित नहीं हो जाता। यह भी जरूरी है कि दोनों के बीच ऐसा रिश्ता हो, जिसे कानून की नजर में मान्यता मिल सके। इसी आधार पर महिला को मांगी गई राहत नहीं मिली।
