Chhattisgarh School Prayer Row: सरकारी स्कूलों में वैदिक मंत्रोच्चार पर बढ़ा विवाद, मसीह समाज ने कोर्ट जाने की दी चेतावनी
रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में वैदिक मंत्रोच्चार को अनिवार्य किए जाने के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। राज्य सरकार के इस निर्णय को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। जहां एक ओर सरकार इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष और ईसाई समाज के कुछ संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है।
कांग्रेस नेताओं ने इस फैसले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि सरकारी स्कूल शिक्षा के केंद्र हैं और वहां किसी एक धार्मिक परंपरा से जुड़े मंत्रों को अनिवार्य करने से विभिन्न समुदायों के बीच असहजता पैदा हो सकती है। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था में वैचारिक हस्तक्षेप की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं, क्रिश्चियन वेलफेयर सोसायटी ने इस निर्णय का विरोध करते हुए ईसाई समुदाय के विद्यार्थियों और शिक्षकों को इससे छूट देने की मांग की है। सोसायटी के पदाधिकारियों का कहना है कि भारत का संविधान सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान की बात करता है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो मामले को न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।
इस बीच कुछ शिक्षकों और स्कूल प्रबंधनों ने भी अनौपचारिक तौर पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि शिक्षा संस्थानों में धार्मिक गतिविधियों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए, ताकि किसी प्रकार का विवाद या भ्रम पैदा न हो। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक आपत्ति सामने नहीं आई है।
राज्य सरकार ने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि वैदिक मंत्र किसी विशेष धर्म के प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि विद्यार्थियों को भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के उद्देश्य से यह पहल की गई है। फिलहाल, इस मुद्दे पर सरकार और विरोधी पक्षों के बीच मतभेद बरकरार हैं, जिससे आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।
