आखिर क्यों नितिन गडकरी को भाजपा ने संसदीय बोर्ड से लगाया किनारे, जानिए, इसकी वजह…

आखिर क्यों नितिन गडकरी को भाजपा ने संसदीय बोर्ड से लगाया किनारे, जानिए, इसकी वजह…

आखिर क्यों नितिन गडकरी को भाजपा ने संसदीय बोर्ड से लगाया किनारे, जानिए, इसकी वजह… भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड से नितिन गडकरी का बाहर होना हर किसी के लिए चौंकाने वाला है। इसको लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि आखिर क्यों नितिन गडकरी को संसदीय बोर्ड से बाहर किया गया अहम […]

आखिर क्यों नितिन गडकरी को भाजपा ने संसदीय बोर्ड से लगाया किनारे, जानिए, इसकी वजह…


भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड से नितिन गडकरी का बाहर होना हर किसी के लिए चौंकाने वाला है। इसको लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि आखिर क्यों नितिन गडकरी को संसदीय बोर्ड से बाहर किया गया अहम बात यह है कि नितिन गडकरी को केंद्रीय युनाव कमेटी तक में जगह नहीं दी गई है। वहीं देवेंद्र फडणवीस को केंद्रीय चुनाव कमेटी में जगह मिली है। भाजपा के इस फैसले को महाराष्ट्र और केंद्र की राजनीति में बड़ा कदम माना जा रहा है। नितिन गडकरी को दोनों ही पैनल से बाहर किए जाने के फैसले को उनके डिमोशन के रूप में देखा जा रहा है।

सिर्फ मंत्री, संगठन से दूर

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नितिन गडकरी को केंद्र में बेहतर मंत्रियों के तौर पर जाना जाता है। उनकी प्रसंशा विपक्षी दल भी करते हैं। लेकिन नितिन गडकरी के पास अब सिर्फ सड़क एवं परिवहन मंत्राल ही है। उनका पास भाजपा के संगठन में कोई पद नहीं है और ना ही उन्हें किसी राज्य का प्रभारी बनाया गया है। काफी लंबे समय तक गडकरी ने पार्टी के लिए अहम भूमिका अदा की है। यहां यह भी याद करने वाली बात है कि पिछले कुछ सालों में पांच राज्यों में हुए चुनाव में भी नितिन गडकरी कहीं नजर नहीं आए। इस साल यूपी के चुनाव में भी गडकरी प्रचार अभियान में कहीं नहीं दिखे।

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टूटी परंपरा

भाजपा में इसकी परंपरा रही है कि पार्टी के पूर्व अध्यक्षों को संसदी बोर्ड में जगह मिलती रही है। फिर वह अमित शाह हों, राजनाथ सिंह हो, उन्हें संसदीय बोर्ड में जगह दी गई है। इस परंपरा को लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को ही तोड़ा गया था, जब दोनों को बोर्ड से बाहर किया गया था। हालांकि ये दोनों ही नेता काफी उम्रदराज हो गए थे, माना जा रहा है कि इस वजह से उन्हें बाहर किया गया। लेकिन नितिन गडकरी अभी भी सक्रिय राजनीति में हैं और देश के सबसे अहम मंत्रालय में से एक का जिम्मा संभाल रहे हैं। हालांकि भाजपा के इस फैसले के बाद से गडकरी की ओर से कोई भी बयान सामने नहीं आया है।

2013 में नहीं मिला दूसरा कार्यकाल

भाजपा के शीर्ष स्तर पर 8 साल के बाद बदलाव किया गया है। इसके कई मायने हैं। इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। साल 2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था तो उस समय नितिन गडकरी को लगातार दूसरा भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल मिलने जा रहा था। लेकिन तब उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगाए गए और राजनाथ सिंह को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया। जिसके बाद राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी के दिल्ली आने का रास्ता साफ किया। उस वक्त इस तरह की अटकलें भी लगाई जा रही थी कि शायद गडकरी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। लेकिन यह सवाल अब इसलिए निरर्थक है क्योंकि पीएम मोदी ने खुद को निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित कर लिया है।

महाराष्ट्री की सियासत से किए गए दूर

नितिन गडकरी अक्सर इस तरह के बयान देते रहते हैं जिससे कयास लगाए जाते हैं कि सरकार में सबकुछ ठीक नहीं चल रही है। उन्हें एक मुखर नेता के तौर पर जाना जाता है और वह खुलकर अपने दिल की बात लोगों के बीच रखते भी हैं। कई बार तो भाजपा को और सरकार को नितिन गडकरी के बयानों की वजह से मुश्किल का सामना करना पड़ा था। हाल ही में जब महाराष्ट्र में सियासी उठापटक हुई तो नितिन गडकरी इस पूरे घटनाक्रम से दूर रहे हैं, उन्हें किसी भी तरह की चर्चा में शामिल नहीं किया गया। जब शिवसेना में टूट हुई तो भी नितिन गडकरी की भूमिका कहीं नजर नहीं आई।

अलग अंदाज पड़ा भारी!

फिलहाल ऐसा लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने नितिन गडकरी को अहम बोर्ड से हटाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अगर आपको सरकार में रहना है तो आपको पार्टी और सरकार के खिलाफ इस तरह का कोई बयान नहीं देना चाहिए जिससे कि पार्टी और सरकार को किसी भी तरह की कोई मुश्किल आए। पार्टी ने पिछले कुछ सालों में अपनी विचारधारा को तेजी से बढ़ाया है। इसे ना सिर्फ सरकार बल्कि संगठन में भी लागू किया जा रहा है। लेकिन नितिन गडकरी का काम करना का अंदाज इससे थोड़ा जुदा है। ऐसे में माना जा रहा है कि अपने जुदा अंदाज के चलते भी उन्हें यह नुकसान उठाना पड़ा है।

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