बिहार में आज भी जिंदा हैं आजादी के 196 योद्धा, देश में दूसरे नंबर पर; पेंशन से लेकर मुफ्त इलाज तक मिलती हैं ये सुविधाएं
पटना। देश जब 80वें स्वतंत्रता दिवस पर आजादी का जश्न मना रहा है, ऐसे वक्त में उन बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना भी जरूरी है, जिनके संघर्ष और बलिदान की बदौलत आज देश में तिरंगा शान से लहरा रहा है। बिहार में आज भी 196 स्वतंत्रता सेनानी जीवित हैं, जो देश के किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। इस सूची में तेलंगाना सबसे आगे है। इनमें कई स्वतंत्रता सेनानी उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, जहां उनके जीवन की कहानी आज की पीढ़ी के लिए इतिहास की जीवंत किताब जैसी है।
बिहार में 196 स्वतंत्रता सेनानी आज भी हैं जीवित
आजादी के आंदोलन में बिहार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोगों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया था।समय के साथ अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी दुनिया से विदा हो चुके हैं, लेकिन 196 सेनानी आज भी जीवित हैं। यही वजह है कि जीवित स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या के मामले में बिहार देश में दूसरे स्थान पर है। तेलंगाना इस मामले में पहले स्थान पर है, जबकि महाराष्ट्र में भी 100 से ज्यादा स्वतंत्रता सेनानियों के जीवित होने की जानकारी सामने आई है।
100 साल से ज्यादा उम्र में भी जिंदा है आजादी की कहानी
बिहार के बांका की कमलेश्वरी चौधरी जैसे स्वतंत्रता सेनानी आज भी अपने जीवन के अनुभवों के साथ मौजूद हैं। वहीं नवादा के बाबू बटोरन सिंह और जमुई के रामधारी सिंह जैसे सेनानी अब इस दुनिया में नहीं हैं। इन सेनानियों की उम्र और उनकी संघर्ष यात्रा यह याद दिलाती है कि आजादी केवल इतिहास की किताबों का अध्याय नहीं, बल्कि उन लोगों की जिंदगी का हिस्सा थी जिन्होंने अपने युवा जीवन का बड़ा हिस्सा देश के लिए संघर्ष में लगा दिया।
कौन कहलाता है स्वतंत्रता सेनानी?
स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा उन राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को दिया गया जिन्होंने ब्रिटिश शासन से भारत की मुक्ति के आंदोलन में योगदान दिया। इसके अलावा गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराने वाले आंदोलनकारियों, हैदराबाद मुक्ति संघर्ष से जुड़े लोगों और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से जुड़े पात्र सदस्यों को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया।
1972 में शुरू हुई थी पेंशन योजना
स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान और आर्थिक सहायता के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 1972 में स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना शुरू की थी। इसकी शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 200 रुपये प्रतिमाह की पेंशन से हुई थी। समय के साथ इस योजना में बदलाव हुए और स्वतंत्रता सेनानियों तथा उनके परिवारों को मिलने वाली सुविधाओं का दायरा बढ़ाया गया।
जीवनसाथी और आश्रितों के लिए भी प्रावधान
स्वतंत्रता सेनानी के निधन के बाद उनके पात्र जीवनसाथी और आश्रितों के लिए भी आर्थिक सहायता का प्रावधान है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पात्र जीवनसाथी और अधिकतम तीन आश्रित बेटियों को पेंशन संबंधी लाभ मिल सकता है। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को सम्मान के साथ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना है।
पोता-पोती और नाती-नतिनियों को भी नौकरी में आरक्षण
बिहार में स्वतंत्रता सेनानी परिवारों के लिए एक विशेष प्रावधान भी है। स्वतंत्रता सेनानियों के पोता-पोती और नाती-नतिनियों को सरकारी नौकरियों में 2 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था बताई गई है। यह व्यवस्था स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने वाले परिवारों की अगली पीढ़ी को अवसर देने के उद्देश्य से की गई है।
ट्रेन में आजीवन मुफ्त यात्रा
स्वतंत्रता सेनानियों को रेलवे यात्रा में भी विशेष सुविधा मिलती है। उपलब्ध प्रावधान के तहत वे अपने एक सहयोगी के साथ राजधानी, शताब्दी, जनशताब्दी, दूरंतो समेत ट्रेनों में आजीवन नि:शुल्क यात्रा कर सकते हैं। यानी देश के लिए संघर्ष करने वाले इन बुजुर्गों की यात्रा को भी सरकार की ओर से सुविधाजनक बनाने का प्रावधान है।
इलाज का खर्च भी सरकार उठाती है
स्वतंत्रता सेनानियों और पात्र आश्रितों को केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) के तहत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के अस्पतालों में भी निर्धारित प्रावधानों के तहत मुफ्त उपचार की सुविधा मिलती है। उम्रदराज स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह सुविधा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
दिल्ली आने पर बिहार भवन में ठहरने की सुविधा
स्वतंत्रता सेनानी और उनके पात्र आश्रित एक सहयोगी के साथ नई दिल्ली स्थित बिहार भवन में नि:शुल्क ट्रांजिट आवास की सुविधा भी प्राप्त कर सकते हैं। इसका उद्देश्य इलाज, सरकारी काम या अन्य जरूरी कारणों से दिल्ली आने वाले सेनानियों और उनके परिवारों को ठहरने की सुविधा उपलब्ध कराना है।
कई राज्यों में अब एक भी जीवित स्वतंत्रता सेनानी नहीं
देश के कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अब एक भी स्वतंत्रता सेनानी जीवित नहीं बचा है। इनमें सिक्किम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मेघालय, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह, लद्दाख और लक्षद्वीप शामिल बताए गए हैं। इनमें कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां स्वतंत्रता सेनानियों के जीवनसाथी या आश्रित भी अब मौजूद नहीं हैं।
आजादी का जश्न, लेकिन इन बुजुर्गों के साथ इतिहास आज भी जिंदा
आज जब देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, बिहार के ये 196 स्वतंत्रता सेनानी उस दौर की जीवित निशानी हैं, जब आजादी हासिल करना कोई आसान सपना नहीं था। सरकार की पेंशन, इलाज, यात्रा और अन्य सुविधाएं उनके सम्मान का एक माध्यम हैं, लेकिन इनके संघर्ष और अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
