दीदी के गढ़ में बगावत का विस्फोट! TMC दोफाड़, नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान

दीदी के गढ़ में बगावत का विस्फोट! TMC दोफाड़, नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर लंबे समय से चल रही असंतोष की राजनीति खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के एक प्रभावशाली बागी गुट ने संगठनात्मक पुनर्गठन का दावा करते हुए वरिष्ठ नेता अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। इस फैसले ने राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है और पार्टी के भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

बागी नेताओं की बैठक में हुआ बड़ा फैसला
सूत्रों के मुताबिक, कोलकाता में आयोजित एक अहम बैठक में बागी नेताओं ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव रखा। बैठक की अगुवाई कर रहे वरिष्ठ नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि यह कदम पार्टी के संविधान और आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के तहत उठाया गया है। बैठक में शामिल नेताओं ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाते हुए नई कार्यकारिणी के गठन का ऐलान किया है। साथ ही यह भी कहा गया कि पार्टी को नए नेतृत्व और नई दिशा की आवश्यकता है।

तीन खेमों में बंटी नजर आ रही पार्टी
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस इस समय तीन अलग-अलग गुटों में विभाजित दिखाई दे रही है। एक धड़ा बागी विधायकों का है, दूसरा कुछ सांसदों और वरिष्ठ नेताओं का, जबकि तीसरा समूह अब भी ममता बनर्जी के समर्थन में मजबूती से खड़ा है। बागी गुट की ओर से यह भी इशारा दिया गया कि ममता बनर्जी को संगठन में सम्मानजनक भूमिका देने का प्रस्ताव रखा जा सकता है। हालांकि इस संबंध में पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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नई टीम में कई वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी
अरूप रॉय के नेतृत्व में घोषित नई कार्यकारिणी में कई अनुभवी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने के उद्देश्य से उपाध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष जैसे पदों पर नई नियुक्तियों का ऐलान किया गया है। बागी खेमे का कहना है कि जल्द ही जिला स्तर से लेकर राज्य इकाइयों तक नए संगठनात्मक ढांचे की घोषणा की जाएगी, ताकि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।

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कौन हैं अरूप रॉय?
अरूप रॉय पश्चिम बंगाल की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं। छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले रॉय लंबे समय तक ममता बनर्जी के करीबी सहयोगियों में गिने जाते रहे हैं। हावड़ा क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है। वर्ष 2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद वे राज्य सरकार में मंत्री भी रहे और संगठनात्मक स्तर पर लगातार सक्रिय रहे। राजनीतिक गलियारों में उन्हें जमीनी नेता और मजबूत संगठनकर्ता के रूप में पहचान मिली है। अब बागी खेमे द्वारा उन्हें नए नेतृत्व के तौर पर सामने लाए जाने के बाद बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

कानूनी और राजनीतिक लड़ाई की तैयारी
बागी नेताओं ने संकेत दिए हैं कि नए संगठनात्मक ढांचे से जुड़े दस्तावेज जल्द ही निर्वाचन आयोग को सौंपे जाएंगे। दूसरी ओर, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस विवाद को लेकर कानूनी और राजनीतिक संघर्ष और तेज हो सकता है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल की राजनीति की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी और उनका आधिकारिक गुट इस चुनौती का जवाब किस तरह देता है ?

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