स्टेशन की रातों से बॉलीवुड की रोशनी तक… बैहर के मुश्ताक खान ने ऐसे रचा अपना फिल्मी सफर

स्टेशन की रातों से बॉलीवुड की रोशनी तक… बैहर के मुश्ताक खान ने ऐसे रचा अपना फिल्मी सफर

बालाघाट। किसी फिल्म में किरदार कितना लंबा है, यह जरूरी नहीं… असली मायने यह रखते हैं कि वह किरदार दर्शकों के जेहन में कितनी देर तक रहता है। मुश्ताक खान ऐसे ही कलाकार थे। पर्दे पर उन्हें कई बार कुछ ही मिनट मिले, लेकिन अपनी अदाकारी और खास अंदाज से उन्होंने उन पलों को यादगार बना दिया। 24 सितंबर 2026 को मुंबई के नानावटी अस्पताल में कैंसर से जूझते हुए उनके निधन की खबर ने फिल्म जगत के साथ उनके गृह क्षेत्र बालाघाट को भी गमगीन कर दिया।

मुश्ताक खान का सफर किसी फिल्मी परिवार से निकले स्टार का सफर नहीं था। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैहर से शुरू हुई उनकी कहानी में छोटे शहर के सपने, मुंबई की मुश्किलें और वर्षों की मेहनत शामिल रही। आगे चलकर यही कलाकार ‘वेलकम’, ‘गदर’, ‘आशिकी’, ‘हेरा फेरी’ और ‘मुझसे शादी करोगी’ जैसी फिल्मों में नजर आया और चरित्र अभिनेता के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाई।

बैहर में पला अभिनय का जुनून
मुश्ताक खान का बचपन बैहर में बीता। उनका परिवार होटल व्यवसाय से जुड़ा था, लेकिन उनका मन कारोबार से ज्यादा रंगमंच और अभिनय की तरफ खिंचता था। स्कूल और कॉलेज के दिनों में नाटकों से जुड़ने के बाद उनके भीतर फिल्मों में काम करने का सपना और मजबूत होता गया।

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एक छोटे कस्बे से निकलकर मुंबई पहुंचना आसान नहीं था। लेकिन मुश्ताक ने शुरुआती मुश्किलों को अपने रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया। उनका मानना था कि सपने देखने पर कोई सीमा नहीं होनी चाहिए और उनकी जिंदगी इसी सोच की मिसाल बन गई।

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मुंबई में पहचान नहीं, पहले संघर्ष मिला
मुंबई पहुंचने के बाद उन्हें वह चमकदार दुनिया नहीं मिली जिसकी तस्वीर आमतौर पर फिल्मों में दिखाई जाती है। काम की तलाश में लंबा इंतजार करना पड़ा और शुरुआती दौर में रहने की परेशानी भी सामने आई। रिपोर्टों के मुताबिक, संघर्ष के दिनों में उन्होंने रेलवे स्टेशन और फुटपाथ तक पर रातें गुजारीं।

उस समय उनके पास अपना फोन तक नहीं था। फिल्मी लोगों से संपर्क बनाए रखने के लिए वे एक किराना दुकानदार का नंबर इस्तेमाल करते थे। कोई संदेश आता तो उसे पहुंचाने के लिए दुकानदार को पैसे देते। महेश भट्ट से मुलाकात की कोशिश भी लंबे समय तक चलती रही। बाद में सलीम खान की मदद से उनकी मुलाकात भट्ट से हुई और उन्हें ‘कब्जा’ में काम करने का मौका मिला।

छोटे किरदारों से बना बड़ा नाम
मुश्ताक खान ने अपने करियर में किसी एक तरह के किरदार तक खुद को सीमित नहीं रखा। ‘आशिकी’, ‘दिल है कि मानता नहीं’ और ‘सड़क’ जैसी फिल्मों से लेकर ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘हेरा फेरी’, ‘गदर: एक प्रेम कथा’, ‘मुझसे शादी करोगी’ और ‘वांटेड’ तक वह अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाई दिए।

उनकी खासियत यह थी कि उन्हें फिल्म में भले ही मुख्य भूमिका न मिली हो, लेकिन किरदार को अपनी शैली में ढालने की क्षमता उनके पास थी। यही वजह रही कि लंबे करियर में वह हिंदी सिनेमा का एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए।

‘वेलकम’ ने बदल दी पहचान
साल 2007 में आई ‘वेलकम’ उनके करियर के सबसे यादगार पड़ावों में शामिल हुई। फिल्म में उन्होंने नाना पाटेकर के किरदार उदय शेट्टी के गैंग में शामिल बल्लू की भूमिका निभाई थी। किरदार छोटा था, लेकिन उनकी कॉमिक टाइमिंग और संवाद अदायगी ने उसे अलग पहचान दे दी। फिल्म का उनका नकली पैर वाला संवाद इतना लोकप्रिय हुआ कि वर्षों बाद भी सोशल मीडिया पर उनके किरदार के क्लिप और मीम्स देखने को मिलते रहे। हाल में निर्देशक अनीस बज्मी ने भी बताया कि यह मशहूर संवाद सेट पर तैयार हुआ था।

‘गदर’ से टीवी तक लगातार सक्रिय रहे
मुश्ताक खान ने ‘गदर: एक प्रेम कथा’ में गुल खान का किरदार निभाया था। बाद में वह ‘गदर 2’ में भी इसी फ्रेंचाइजी का हिस्सा बने। इसके अलावा उनके खाते में ‘स्त्री 2’ समेत कई बाद की फिल्में भी रहीं। सिनेमा के साथ उन्होंने टेलीविजन पर भी काम किया। ‘नुक्कड़’, ‘वागले की दुनिया’, ‘भारत एक खोज’, ‘अदालत’ और ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’ जैसे टीवी प्रोजेक्ट्स में उनकी मौजूदगी ने उनके अभिनय के दायरे को और बड़ा किया।

मुंबई की कामयाबी के बावजूद बैहर नहीं भूले
बॉलीवुड में पहचान मिलने के बाद भी मुश्ताक खान की जड़ें बैहर से जुड़ी रहीं। उनके परिवार का होटल कारोबार आज भी उनके गृह क्षेत्र से उनकी पहचान जोड़ता है। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद बालाघाट और बैहर में शोक की लहर देखने को मिली।

मुश्ताक खान का जीवन उन कलाकारों की कहानी है जिन्होंने स्टार बनने के बजाय अपने हिस्से के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया। बैहर से शुरू हुआ उनका सफर मुंबई तक पहुंचा और वहां उन्होंने ऐसे कई किरदार छोड़े जिन्हें दर्शक आज भी नाम से नहीं तो चेहरे और संवाद से पहचान लेते हैं। उनका सफर भले 24 सितंबर को थम गया, लेकिन बल्लू और गुल खान जैसे किरदारों के जरिए मुश्ताक खान हिंदी सिनेमा की यादों में लंबे समय तक मौजूद रहेंगे।

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